भूगृहस्य चतुष्कोणे विलिखेन्मूलमम्बिके । पञ्चवर्णरजोभिश्च शुभं दृष्टिमनोहरम् ॥ एवं यन्त्रं समालिख्य विधिवन्मन्त्रवित्तमः । एकत्रिषड्वसुचतुः कलसान् स्थापयेत् प्रिये ॥ मध्यादिचतुरस्त्रान्तं द्वात्रिंशत् कलसान् प्रिये । अथवाष्टादशेशानि सप्त वा दश वा प्रिये ॥ चतुरो वाप्यथैकं वा कुर्यात् साधकसत्तमः ।
हे अम्बिके! भूपुर के चार कोनों में मूलमन्त्र को लिखे। पाँच रंगों को मिट्टी से यन्त्र को सुन्दर बनाये। इस प्रकार विधिवत् यन्त्र को लिखकर मन्त्रवेत्ता साधक यन्त्र के मध्य में और हे प्रिये! भूपुर के चारों कोनों में क्रमशः एक, तीन, छः, आठ, चार-कुल बाईस कलशों की स्थापना करे। हे प्रिये! हे ईशानि! अथवा अथवा उत्तम साधक यथासामर्थ्य १८, १०, ७, ४ या केवल एक ही कलश स्थापित करे।
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