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कुलार्णव • अध्याय 16 • श्लोक 11
प्रयोगान्ते चक्रपूजां विधिनैव समाचरेत् । लक्षमेकं जपेन्मन्त्रं न्यासध्यानसमन्वितः ॥ प्रयोगदोषशान्त्यर्थमात्मरक्षार्थमेव च। न चेत् फलं न चाप्नोति देवताशापमाप्नुयात् ॥
प्रयोग के दोषों की शान्ति के लिए और अपनी रक्षा के लिये प्रयोग के अन्त में विधि पूर्वक चक्रपूजा करे और न्यास ध्यानपूर्वक मन्त्र का एक लाख जप कर ले। नहीं तो, अभीष्ट फल नहीं मिलता, अपितु देवता का शाप मिलता है।
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