मन्त्र और विद्या की अभिन्नता, उनके निद्रा और बोधरूपों तथा स्त्री-पुं-नपुंसकादि लिङ्गभेद को जानकर कर्मों को सिद्ध करे। स्वर, वर्ण और पद, चैतन्य और सूतक तथा हस्व, दीर्घ, प्लुत आदि को जानकर मन्त्र की साधना करे।
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