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कुलार्णव • अध्याय 16 • श्लोक 56
हृत्पद्मकर्णिकामध्ये सूर्यमण्डलसंस्थितम् । पराप्रासादबीजन्तु तरुणारुणसन्निभम् ॥ जवाबन्धूकसिन्दूरपद्मरागप्रभोज्ज्वलम् । पञ्चविशतिभिः स्पर्शाक्षरैः संवीतमम्बिके ॥ तत्प्रभापटलच्छायाव्यक्तीकृतजगत्त्रयम् । आत्मानञ्च स्मरेद्देवि निश्चलेनान्तरात्मना ॥
हृदयकमल की कर्णिका के मध्य में सूर्यमण्डल में स्थित पराप्रासाद बीज का ध्यान इस प्रकार करे कि वह तरुण अरुण के समान प्रकाशमान है, जवा, बन्धूक, पद्मराग जैसी उसकी उज्ज्वल सिन्दूरी प्रभा है। पचीस स्पर्शाक्षरों से वेष्टित उसके प्रभा पटल की छाया से तीनों लोक रक्ताभ दिखाई देते हैं और हे देवि! निश्चल अन्तरात्मा से अपने को भी उसी से अभिभूत अनुभव करे।
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