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कुलार्णव • अध्याय 16 • श्लोक 87
निम्बकारस्करोन्मत्तकण्टकीविप्रदन्तिभिः । अस्थिकण्टक वृक्षाद्यैर्द्रव्यैरशुभसाधनैः ॥ वटुकैः कृष्णवर्णैश्च समित्पत्रफलान्तरैः ॥ गृहधूमचिताङ्गारत्रिकट्वम्लचिताञ्जनैः उन्मत्तरससंसिक्तै पिष्ट्‌वा सम्यक् प्रसेचितैः । साध्यपादरजोभिश्च चिताभस्मसमन्वितैः ॥ साध्यप्रतिकृतिं कुयदिकनक्षत्रवृक्षजाम् । सम्यक्प्रतिष्ठितप्राणां कुण्डस्योपरि लम्बयेत् ॥ खनेत्तत्प्रतिमां मन्त्री कुण्डस्याधो यथाविधि । मलीमसेन मनसा चोप्रदृष्टिरमर्षणः ॥ चितानले विषतरु सप्तकाष्ठसमेधिते । तद्रव्यैर्जुहुयाद्देवि विधिवन्मन्त्रवित्तमः ॥ कुर्याद्विद्वेषणोच्चाटमारणानि न संशयः ।
फिर नीम, कारस्कर, उन्मत्त, कण्टकी, विप्रदन्त, अस्थि, कण्टकादि वृक्षों और अशुभ साधनों द्वारा तथा कृष्णवर्ण के बटुकों एवं विभिन्न समिधाओं, पत्रफलों को गृहधूम, चिताङ्गार, त्रिकटु (पीपर, मिरिच, सोंठ) अम्ल चिता के अञ्जन को उन्मत्त के रस में अच्छी तरह भिगोकर पीसे और साध्य के पैरों को मिट्टी को चिताभस्म से युक्त कर साध्य की प्रतिमूर्ति बनाए। उसमें प्राणप्रतिष्ठा कर उसे कुण्ड के नीचे यथाविधि गाड़ दे। हे देवि! फिर मलिन मन से, उग्रदृष्टि होकर, अमर्ष के साथ मन्त्रज्ञ साधक सात विषतरुओं की लकड़ी से प्रज्वलित चिताग्नि में उक्त द्रव्यों से विधिवत् होम करे। इससे विद्वेषण, उच्चाटन, मारण होते हैं, इसमें सन्देह नहीं।
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