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कुलार्णव • अध्याय 16 • श्लोक 58
देवदानवगन्धर्वसिद्धकिन्नरगुह्यकान् विद्याधरान्मुनीन् यक्षान् नागानप्सरसः स्त्रियः ॥ सिंहव्याघ्रोरगेन्द्रादीनन्यान् दुष्टमृगानपि । वश्यान् करोत्यसन्देहं किं पुनर्मानवादिकान् ॥
इस विधान से देव, दानव, गन्धर्व, सिद्ध, किन्नर, गुह्यक, विद्याधर, मुनि, यक्ष, नाग, अप्सराएँ, स्त्रियाँ, सिंह, व्याघ्र, सर्प आदि और अन्य सभी दुष्ट पशु भी साधक के वशीभूत हो जाते हैं, फिर साधारण मनुष्यों की क्या बात है।
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