लक्षणान्येवमादीनि ज्ञात्वा गुरुमुखात् प्रिये ।
सर्वकर्माणि कुर्वीत मन्त्री तत्तत्फलाप्तये ॥
हे प्रिये! इस प्रकार मन्त्रज्ञ साधक उक्त लक्षणों को गुरुमुख से जानकर सभी कर्मों को उनका फल पाने के लिये विधिपूर्वक अनुष्ठान करे।
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