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कुलार्णव • अध्याय 16 • श्लोक 7
ततः स्वमनसोऽभीष्टान् प्रयोगान् कुलनायिके ॥ मन्त्रेणानेन मतिमान् साधयेद् भुक्तिमुक्तये । सिद्धमन्त्रस्य सिध्यन्ति षट् कर्माणि न संशयः । नैव सिध्यन्त्यसिद्धस्य देवताशापमाप्नुयात् ॥
हे कुलनायिके! इसके बाद ही बुद्धिमान् साधक भुक्ति एवं मुक्ति के लिए इस (परा प्रासाद) मन्त्र से अपने अभीष्ट प्रयोगों का साधन करे। इसमें सन्देह नहीं है कि सिद्धमन्त्र का षट्‌कर्म (मारण, मोहन, वशीकरण, उच्चाटन, स्तम्भन और शान्ति) में प्रयोग सिद्धि प्रदान करता है। असिद्ध मन्त्र सिद्ध नहीं होते और साांधक देवता का शाप प्राप्त करता है।
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