इससे अपमृत्यु, महान् रोग, जरा और मरणजन्य भय तथा ग्रह, अपस्मार, वेताल भूतोन्माद से होने वाले भय दूर होकर आधि व्याधि से रहित होकर साधक पुत्र पौत्र से सम्पन्न होता हुआ सौ वर्ष तक जीवित रहता है। साथ ही सभी मनुष्यों द्वारा पूजित होता है।
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