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अध्याय 7 — सातवाँ अध्याय
विदुर नीति
85 श्लोक • केवल अनुवाद
धृतराष्ट्र ने कहा - विदुर! यह पुरुष ऐश्वर्य की प्राप्ति, और नाश में स्वतंत्र नहीं है। ब्रह्मा ने धागे से बँधी हुई कठपुतली की भाँति, इसे प्रारब्ध के अधीन कर रखा है। इसलिये तुम कहते चलो, मैं सुनने के लिये धैर्य धारण किये बैठा हूँ।
विदुरजी बोले - भारत! समय के विपरीत यदि बृहस्पति भी कुछ बोले, तो उनका अपमान ही होगा, और उनकी बुद्धि को भी अवज्ञा ही होगी।
संसार में कोई मनुष्य दान देते से प्रिय होता है, दुसरा प्रिय वचन बोलने से प्रिय होता है, और तीसरा मन्त्र तथा औषध के बल से प्रिय होता है, किंतु जो वास्तव में प्रिय है, वह तो सदा प्रिय ही है।
जिस से द्वेष हो जाता है, वह न साधु ,न विद्वान्, और न बुद्धिमान् ही जान पड़ता है। प्रियतम के तो सभी कर्म शुभ ही प्रतीत होते हैं, और शत्रु के सभी कर्म पापमय।
राजन्। दुर्योधन के जन्म लेते ही मैंने कहा था, कि केवल इसी एक पुत्र को तुम त्याग दो। इसके त्याग से सौ पुत्रों की वृद्धि होगी, और इसका त्याग न करने से, सौ पुत्रों का नाश होगा।
जो बुद्धि भविष्य में नाश का कारण बने, उसे अधिक महत्त्व नहीं देना चाहिए, और उस क्षय का भी बहुत आदर करना चाहिये, जो आगे चलकर अभ्युदय का कारण हो।
महाराज! वास्तव र्मे जो क्षय वृद्धि का कारण होता है, वह क्षय ही नहीं है, किंतु उस लाभ को भी क्षय ही मानना चाहिये, जिसे पाने से बहुत से लाभों का नाश हो जाय।
कुछ लोग गुण के घनी होते हैं, और कुछ लोग धन के धनी। जो धन के धनी होते हुए भी गुण के कंगाल हैं, उन्हें सर्वथा त्याग दीजिये।
धृतराष्ट्र ने कहा - लोग इसका अनुमोदन करते हैं, यह भी ठीक है कि जिस ओर धर्म होता है, उसी पक्ष की जीत होती है, तो भी मैं अपने बेटे का त्याग नहीं कर सकता।
विदुरजी बोले - जो अधिक गुणों से सम्पन्न और विनयी है, वह प्राणियों का तनिक भी संहार होते देख, उसकी कभी उपेक्षा नहीं कर सकता।
जो दूसरों की निन्दा में ही लगे रहते हैं, दूसरों को दुख देने, और आपस में फूट डालने के लिये, सदा उत्साह के साथ प्रयत्न करते हैं।
जिसका दर्शन दोष से भरा (अशुभ) है, और जिनके साथ रहने में भी बहुत बड़ा खतरा है, ऐसे लोगों से धन लेने में महान् दोष है, और उन्हें देने में बहुत बड़ा भय है।
दूसरों में फूट डालने का जिनका स्वभाव है, जो कामी, निल्लज्ज, शठ, और प्रसिद्ध पापी हैं, वे साथ रखने के अयोग्य - निन्दित माने गये हैं।
उपर्युक्त दोषों के अतिरिक्त, और भी जो महान् दोष हैं, उनसे युक्त मनुष्य का त्याग कर देना चाहिये। सौहार्द भाव निवृत्त हो जाने पर, नीच पुरुषों का प्रेम नष्ट हो जाता है, उस सौहार्द से होने वाले फल की सिद्धि, ओर सुख का भी नाश हो जाता है।
फिर वह नीच पुरुष निन्दा करने के लिये यत्न करता है, थोडा भी अपराध हो जाने पर, माहवश विनाश के लिये उद्योग आरम्भ कर देता है, उसे तनिक भी शान्ति नहीं मिलती।
वैसे नीच, क्रूर, तथा अजितेन्द्रिय पुरुषो से होने वाले सङ्ग पर, अपनी बुद्धि से पूर्ण विचार करके विद्वान् पुरुष, उसे दूर से ही त्याग दे।
जो अपने कुटुम्बी, दरिद्र, दीन, तथा रोगी पर अनुगरह करता है, वह पुत्र और पशुओ से समृद्ध होता है, और अनन्त कल्याण को अनुभव करता है।
राजेन्द्र, जो लोग अपने भले की इच्छा करते हैं, उन्हें अपने जाती भाइयों को उन्नतिशील बनाना चाहिये, इसलिए आप भली भांति अपने कुल की वृद्धि करें।
राजन्! जो अपने कुटुम्बीजनों का सत्कार करता है, वह कल्याण का भागी होता है।
भरतश्रेष्ठ! अपने कुटुम्ब के लोग गुणहीन हो, तो भी उनकी रक्षा करनी चाहिये। फिर जो आपके कृपाभिलाषी एवं गुणवान् हैं, उनकी तो बात ही क्या है।
राजन! आप समर्थ हैं, वीर पाण्डवो पर कृपा कीजिये, और उनकी जीविका के लिये कुछ गाँव दे दीजिये।
नरेश्वर! ऐसा करने से आपको इस संसार में यश प्राप्त होगा। तात! आप बुद्ध हैं, इसलिये आपको अपने पुत्रो पर शासन करना चाहिये।
भरतश्रेष्ठ! मुझे भी आपके हित की ही बाते कहनी चाहिये। आप मुझे अपना हितेषी समझो। तात ! शुभ चाहने चाले को, अपने जाति-भाइयो के साथ कलह नहीं करना चाहिये, अपितु उनके साथ मिलकर सुख का उपभोग करना चाहिये।
जाति-भाइयो के साथ परस्पर भोजन, बातचीत एवं प्रेम करना ही कर्तव्य है, उनके साथ कभी विरोध नही करना चहिये।
इस जगत में जाति-भाई ही तारते और डुबाते भी हैं। उनमें जो सदाचारी हैं, वे तो तारते है, और दुराचारी डुबा देते हैं।
राजेन्द्र! आप पाण्डवो के प्रति सद्व्यवहार करें। मानद! उन से सुरक्षित होकर, आप शत्रुओं के आक्रमण से बचे रहेंगे।
विषैले वाण हाथ में लिये हुए, व्याध के पास पहुँचकर, जैसे मृग को कष्ट भोगना पड़ता है, उसी प्रकार जो जातीय बन्धु, अपने धनी बन्धु के पास पहुंचकर दुख पाता है, उसके पाप का भागी वह धनी होता हैं।
नरश्रेष्ठ! आप पाण्डवों को, अथवा अपने पुत्रों को मारे गये सुनकर, पीछे सन्ताप करेंगे। अतः इस बात का पहले ही विचार कर लीजिये।
इस जीवन का कोई ठिकाना नहीं है। जिस कर्म के करने से अन्त में, खाट पर बैठकर पछताना पड़े, उसको पहले से ही नहीं करना चाहिये।
शुक्राचार्य के सिवा दूसरा कोई भी मनुष्य ऐसा नहीं है, जो नीति का उल्लंघन नहीं करता, अतः जो बीत गया, सो बीत गया। अब शेष कर्तव्य का विचार आप जैसे बुद्धिमान पुरुषो पर ही निर्भर है।
नरेश्वर! दुर्योधन ने पहले, यदि पांडवों कि प्रति, यह अपराध किया ,आप इस कुल में बड़े-बूढ़े हैं, आपके द्वारा उसका मार्जन हो जाना चाहिये।
नरश्रेष्ठ। यदि आप उनको राज पद पर स्थापित कर देंगे, तो संसार में आपका कलंक धुल जायगा, और आप बुद्धिमान् पुरुषों के माननीय हो जायेगे।
जो धीर पुरुषों के वचनो के परिणाम पर विचार करके, उन्हें कार्य रूप में परिणत करता है, वह चिरकाल तक यश का भागी बना रहता है।
कुशल विद्वानों के द्वारा भी उपदेश किया हुआ ज्ञान व्यर्थ है, यदि उससे कर्तव्य का ज्ञान न हुआ, अथवा ज्ञान होने पर भी उसका अनुष्ठान न हुआ।
जो विद्वान पाप-रूप फल देने वाले कर्मों का आरग्भ नहीं करता, वह बढ़ता है, किन्तु जो पूर्व में किये हुए पापो का विचार करके, उन्हीं का अनुसरण करता है, वह खोटी बुद्धि वाला मनुष्य, अगाध कीचड से भरे हुए बीहड़ नरक में गिराया जाता है।
बुद्धिमान् पुरुष मन्त्रभेद के इन छः द्वारों को जाने, और धन को रक्षित रखने की इच्छा से इन्हें सदा बन्द रखे।
नशे का सेवन, निद्रा, आवश्यक बात की जानकारी न रखना, अपने नेत्र, मुख आदि का विकार, दुष्ट मन्त्रियों में विश्वास, और मूर्ख दूत पर भरोसा रखना।
राजन्! जो इन द्वारों को जानकर सदा बंद किये रहता है, वह अर्थ, धर्म, और काम के सेवन में लगा रहकर, शत्रुओ को वश में कर लेता है।
बृहस्पति के समान, मनुष्य भी शास्त्रज्ञान, अथवा बृद्धों की सेवा किये बिना धर्म, और आर्थ का ज्ञान, प्राप्त नही कर सकता।
समुद्र में गिरी हुई वस्तु नष्ट हो जाती है, जो सुनता नहीं उससे कही हुई बात नष्ट हो जाती है, अजितेन्दव पुरुष का शास्त्रज्ञान, और रास्ते मे किया हुआ हवन भी नष्ट ही है।
बुद्धिमान पुरुष बुद्धि से जाँच कर, अपने अनुभव से बारम्बार उनकी योग्यता का निस्चय करें, किर दुसरो से सुनकर, और, स्वयं देखकर भलीभांति विचार करके, विद्वानों के साथ मित्रता करें।
विनय भाव अपयश का नाश करता है, पराक्रम अनर्थ को दूर करता है, क्षमा सदा ही क्रोध का नाश करती है, और सदाचार कुलक्षरण का अन्त करता है।
राजन! नाना प्रकार की भोग सामग्री, माता, घर, स्वागत-सत्कार के ढंग, और भोजन, तथा वस्त्र के द्वारा कुल की परीक्षा करे।
देहाभिमान से रहित पुरुष के पास भी, यदि न्याययुक्त पदार्थ स्वतः उपस्थित हो, तो वह उसका विरोध नहीं करता, फिर कामासक्त मनुष्य के लिये तो कहना ही क्या है?
जो विद्वानों की सेवा में रहने वाला वैद्य, घार्मिक, देखने में सुन्दर, मित्रो से युक्त, तथा मधुरभाषी हो, ऐसे सुहृद् की सर्वथा रक्षा करनी चाहिये।
अधम कुल में उत्पन्न हुआ हो, या उत्तम कुल में, जो मर्यादा का उल्लंघन नहीं करता, धर्म की अपेक्षा रखता है, कोमल स्वभाव वाला तथा सलज है, वह सेकड़ो कुलीनों से बढ़कर है।
जिन दो मनुष्यों का चित्त से चित्त, गुप्त रहस्य से गुप्त रहस्य, और बुद्धि से बुद्धि मिल जाती है, उनकी मित्रता कभी नष्ट नहीं होती।
मेधावी पुरुष को चाहिये, कि टुर्बुद्धि एवं विचार शक्ति से हीन पुरुष का, तुण से ढके हुए कुए की भाँति परित्याग कर दे, वयोंकि उसके साथ की हुई मित्रता नष्ट हो जाती है।
विद्वान् पुरुष को उचित है, कि अभिमानी, मुर्ख, क्रोधी, साहसिक, और धर्महीन पुरुषों के साथ मित्रता न करे।
मित्र तो ऐसा होना चाहिये, जो कतज्ञ, घार्मिक, सत्यवादी, उद्दार दढ़ अनुराग रखने वाला, जितेन्द्रिय, मर्यादा के भीतर रहनेवाला, और मैत्री का त्याग न करने वाला हो।
इन्द्रियों को सर्वथा रोक रखना तो, मृत्यु से भी बढ़कर कटिन है,और उन्हें बिलकुल खुली छोड़ देना, देवताओं का भी नाश कर देता है।
सभी प्राणियों के प्रति सज्जनता, ईर्ष्या से मुक्ति, क्षमा, और धैर्य, ये सब गुण आयु को बढाने वाले हैं, ऐसा विद्वान् लोग कहते हैं।
जो अन्याय से नष्ट हुए धन को, स्थिर बुद्धि का आश्रय ले. अच्छी नीति से पुनः लौटा लाने की इच्छा करता है, वह वीर पुरुषों का सा आचरण करता है।
जो आने वाले दुख को रोकने का उपाय जानता है, वर्तमानकालीन कर्तव्य के पालन में दढ़ निश्चय रखने वाला है, और अतीत काल में जो कर्तव्य शेष रह गया है, उसे भी जानता है, वह मनुष्य कभी अर्थ से हीन नहीं।
मनुष्य मन, वाणी, और कर्म से जिसका निरन्तर सेवन करता है, वह कार्य उस पुरुष को अपनी ओर खींच लेता है। इसलिये सदा कल्याणकारी कार्यो को ही करें।
मांगलिक पदार्थों का स्पर्श, चित्तवृत्तिया का निरोध, शास्त्र का अभ्यास, और सत्पुरुषों का बारम्बार दर्शन, ये सब उद्योगशीलता, कल्याणकारी हैं।
उद्योग में लगे रहना, उस से बिरक्त न होना, धन, लाभ और कल्याण का मूल है। इसलिये उद्योग न छोड़ने वाला मनुष्य महान् हो जाता है, और अनन्त सुख का उपभोग करता है।
तात। समर्थ पुरुष के लिये सब जगह, और सब समय में क्षमा के समान हित कारक, और अत्यन्त श्री सम्पन्न बनाने वाला उपाय, दूसरा नहीं माना गया।
जो शक्तिहीन है, वह तो सब पर क्षमा करे ही, जो शक्तिमान् है, वह भी धर्म के लिये क्षमा करे, तथा जिसकी नज़र में अर्थ और अनर्थ दोनों समान हैं, उसके लिये तो क्षमा सदा ही हितकरिणी होती है।
जिस सुख का सेवन करते रहने पर भी, मनुष्य धर्म और अर्थ से भ्रष्ट नहीं होता, उसका यथेष्ट सेवन करे, किन्तु मूढवत (आसक्ति एवं अन्याय पूर्वक विषय सेवन) न करे।
जो दुःख से पीड़ित, प्रमादी, नास्तिक, आलसी, अजितेन्द्रिय, और उत्साह रहित है, उनके वहाँ लक्ष्मी का वास नहीं होता।
दुर्बुद्धि वाले लोग, सरलता से युक्त और सरलता के ही कारण, लज्जाशील मनुष्य को अशक्त मानकर उसका तिरस्कार करते हैं।
अत्यन्त श्रेष्ठ, अतिशय दानी, अतीव शूरबीर, अधिक व्रत-नियमों का पालन करने वाले, और बुद्धि के घमण्ड में चूर रहने वाले मनुष्य के पास, लक्ष्मी भय के मारे नहीं जाती।
राजलक्ष्मी न तो अत्यन्त गुणवानों के पास रहती है, और न बहुत निगुणों के पास। यह न तो बहुत-से गुणो को चाहती है, और न गुणहीन के प्रति ही अनुराग रस्खती है। उत्तम गौ की भाँति, यह अन्धी लक्ष्मी कहीं-कहीं ही ठहरती हैं।
वेदों का फल है अमिहोत्र करना, शास्त्राध्ययन का फल है सुशीलता और सदाचार, स्त्री का फल है रति-सुख और पुत्र की प्राप्ति, तथा धन का फल है दान और उपभोग।
जो अधर्म के द्वारा कमाये हुए धन से, परलोक साधक यज्ञादि कर्म करता है, वह मरने के पश्चात्, उसके फल को नहीं पाता, क्योकि उसका धन बुरे रास्ते से आया होता है।
घोर जंगल में, दुर्गम मार्ग मे, कठिन आपत्ति के समय, घबराहट में, और प्रहार के लिये शत्रु उठे रहने पर भी, सत्त्व (मनोबल) सम्पन्न पुरुषों को भय नहीं होता।
उद्मोग, संयम, दुक्षता, सावधानी, धैर्य, स्मृति, और सौच-विचारकर इन्हें उन्नति का मूलमन्त्र समझिये।
तपस्वियों का बल है तप, वेदवेत्ताओं का बल है वेद, असाधुओं का बल है हिंसा, और गुणवानो का बल है क्षमा।
जल, मूल, फल, दूध, घी, ब्राह्मण की इच्छापूर्ति, गुरु का वचन, और ओषध, ये आठ व्रत के नाशक नहीं होते।
जो अपने प्रतिकूल जान पड़े, उसे दूसरो के प्रति भी न करे। थोड़े में धर्म का यही स्वरूप है। इसके विपरीत जिसमें कामना से प्रवृत्ति होती है, बह तो अधर्म है।
अक्रोध से क्रोध को जीते, असाधु को सद्व्यवहार से वश में करे, कृपण को दान से जीते, और झूठ पर सत्य से विजय प्राप्त करे।
स्त्री, धूर्त, आलसी, डरपोक, क्रोधी, पुरुषत्व के अभिमानी, चोर, और नास्तिक का विश्वास नहीं करना चाहिये।
जो नित्य गुरुजनों को प्रणाम करता है, और वृद्ध पुरुषों की सेवा में लगा रहता है, उसकी कीर्ति, आयु, यश और बल-ये चारों बढ़ते है।
जो धन अत्यन्त क्लेश उठाने से, धर्म का उल्लङ्गन करने से, अधवा शत्रु के सामने सिर झुकाने से, प्राप्त होता हो, उसमें आप मन न लगाइये।
विद्याहीन पुरुष, सन्तानोत्पत्ति रहित स्त्री प्रसंग, आहार न पाने वाली प्रजा, और बिना राजा के राष्ट्र के लिये, शोक करना चाहिये।
अधिक राह चलना, देहधारियों के लिये दुखरूप बुढ़ापा है, बराबर पानी गिरना पर्वतों का बुढ़ापा है, सम्भोग से वश्चित रहना स्त्रियों के लिये बुढ़ापा हैं, और वचन रूपी बाणों का आघात, मन के लिये बुढ़ापा है।
अभ्यास न करना वेदो का मल है, ब्राह्मणोचित नियमो का पालन न करना, ब्राह्मण का मल है, बाहीक देश, पृथ्वी का मल है, तथा झूठ बोलना पुरुष का मल है, क्रीड़ा एवं हास-परिहास की उत्सुकता, पतिव्रता स्त्री का मल है, और पति के बिना परदेश में रहना, स्त्री मात्र का मल है।
सोने का मल है चाँदी, चाँदी का मल है राँगा, राँगे का मल है सीसा, और सीसा का भी मल है, मल।
सोकर नींद को जीतने का प्रयास न करे। कामोपभाग के द्वारा सत्री को जीतने की इच्छा न करे। लकड़ी डालकर आग को जीतने की आशा न करे, और अधिक पीकर मदिरा पीने की आदत को जीतने का प्रयास न करे।
जिसका मित्र धन-दान के द्वारा वश में आ चुका है, शत्रु युद्ध में जीत लिये गये हैं, और स्त्रियाँ खान-पान के द्वारा वशीभूत हो चुकी हैं, उसका जीवन सफल है।
जिनके पास हजार (रुपये) हैं, वे भी जीवित हैं, तथा जिनके पास सौ (रुपये) हैं, वे भी जीवित हैं, अतः महाराज धूतराष्ट्र! आप अधिक का लोभ छोड़ दीजिये, इससे भी किसी तरह जीवन रहेगा ही।
इस पृथ्वी पर जो भी धान, जो, सोना, पशु, और स्त्रियाँ हैं, वे सब के सब एक पुरुष के लिये भी पूरे नहीं हैं, ऐसा विचार करने वाला मनुष्य, मोह में नहीं पड़ता।
राजन्! मैं, फिर कहता हूँ, यदि आपका अपने पुत्रों और पाण्डवों में समान भाव है, तो उन सभी पुत्रों के साथ एक सा बर्ताव कीजिये।
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