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विदुर नीति • अध्याय 7 • श्लोक 15
यतते चापवादाय यत्नमारभते क्षये । अल्पेऽप्यपकृते मोहान्न शान्तिमुपगच्छति ॥
फिर वह नीच पुरुष निन्दा करने के लिये यत्न करता है, थोडा भी अपराध हो जाने पर, माहवश विनाश के लिये उद्योग आरम्भ कर देता है, उसे तनिक भी शान्ति नहीं मिलती।
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