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विदुर नीति • अध्याय 7 • श्लोक 11
परापवाद निरताः परदुःखोदयेषु च । परस्परविरोधे च यतन्ते सततोथिताः ॥
जो दूसरों की निन्दा में ही लगे रहते हैं, दूसरों को दुख देने, और आपस में फूट डालने के लिये, सदा उत्साह के साथ प्रयत्न करते हैं।
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