द्वाराण्येतानि यो ज्ञात्वा संवृणोति सदा नृप।
त्रिवर्गाचरणे युक्तः स शत्रूनधितिष्ठति ॥
राजन्! जो इन द्वारों को जानकर सदा बंद किये रहता है, वह अर्थ, धर्म, और काम के सेवन में लगा रहकर, शत्रुओ को वश में कर लेता है।
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