यत्सुखं सेवमानोऽपि धर्मार्थाभ्यां न हीयते ।
कामं तदुपसेवेत न मूढ व्रतमाचरेत् ॥
जिस सुख का सेवन करते रहने पर भी, मनुष्य धर्म और अर्थ से भ्रष्ट नहीं होता, उसका यथेष्ट सेवन करे, किन्तु मूढवत (आसक्ति एवं अन्याय पूर्वक विषय सेवन) न करे।
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