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विदुर नीति • अध्याय 7 • श्लोक 23
ज्ञातिभिर्विग्रहस्तात न कर्तव्यो भवार्थिना । सुखानि सह भोज्यानि ज्ञातिभिर्भरतर्षभ ॥
भरतश्रेष्ठ! मुझे भी आपके हित की ही बाते कहनी चाहिये। आप मुझे अपना हितेषी समझो। तात ! शुभ चाहने चाले को, अपने जाति-भाइयो के साथ कलह नहीं करना चाहिये, अपितु उनके साथ मिलकर सुख का उपभोग करना चाहिये।
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