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विदुर नीति • अध्याय 7 • श्लोक 14
निवर्तमाने सौहार्दे प्रीतिर्नीचे प्रणश्यति । या चैव फलनिर्वृत्तिः सौहृदे चैव यत्सुखम् ॥
उपर्युक्त दोषों के अतिरिक्त, और भी जो महान् दोष हैं, उनसे युक्त मनुष्य का त्याग कर देना चाहिये। सौहार्द भाव निवृत्त हो जाने पर, नीच पुरुषों का प्रेम नष्ट हो जाता है, उस सौहार्द से होने वाले फल की सिद्धि, ओर सुख का भी नाश हो जाता है।
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