श्रीमन्तं ज्ञातिमासाद्य यो ज्ञातिरवसीदति ।
दिग्धहस्तं मृग इव स एनस्तस्य विन्दति ॥
विषैले वाण हाथ में लिये हुए, व्याध के पास पहुँचकर, जैसे मृग को कष्ट भोगना पड़ता है, उसी प्रकार जो जातीय बन्धु, अपने धनी बन्धु के पास पहुंचकर दुख पाता है, उसके पाप का भागी वह धनी होता हैं।
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