सहस्रिणोऽपि जीवन्ति जीवन्ति शतिनस्तथा ।
धृतराष्ट्रं विमुञ्चेच्छां न कथं चिन्न जीव्यते ॥
जिनके पास हजार (रुपये) हैं, वे भी जीवित हैं, तथा जिनके पास सौ (रुपये) हैं, वे भी जीवित हैं, अतः महाराज धूतराष्ट्र! आप अधिक का लोभ छोड़ दीजिये, इससे भी किसी तरह जीवन रहेगा ही।
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