न वै श्रुतमविज्ञाय वृद्धाननुपसेव्य वा !
धर्मार्थौ वेदितुं शक्यौ बृहस्पतिसमैरपि ॥
बृहस्पति के समान, मनुष्य भी शास्त्रज्ञान, अथवा बृद्धों की सेवा किये बिना धर्म, और आर्थ का ज्ञान, प्राप्त नही कर सकता।
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