अतिक्लेशेन येऽर्थाः स्युर्धर्मस्यातिक्रमेण च ।
अरेर्वा प्रणिपातेन मा स्म तेषु मनः कृथाः ॥
जो धन अत्यन्त क्लेश उठाने से, धर्म का उल्लङ्गन करने से, अधवा शत्रु के सामने सिर झुकाने से, प्राप्त होता हो, उसमें आप मन न लगाइये।
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