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विदुर नीति • अध्याय 7 • श्लोक 13
ये पाप इति विख्याताः संवासे परिगर्हिताः । युक्ताश्चान्यैर्महादोषैर्ये नरास्तान्विवर्जयेत् ॥
दूसरों में फूट डालने का जिनका स्वभाव है, जो कामी, निल्लज्ज, शठ, और प्रसिद्ध पापी हैं, वे साथ रखने के अयोग्य - निन्दित माने गये हैं।
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