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विदुर नीति • अध्याय 7 • श्लोक 64
न चातिगुणवत्स्वेषा नात्यन्तं निर्गुणेषु च । नैषा गुणान् कामयते नैर्गुण्यात्नानुरज्यते । उन्मत्ता गौरिवान्धा श्रीः क्कचिदेवावतिष्ठते ॥
राजलक्ष्मी न तो अत्यन्त गुणवानों के पास रहती है, और न बहुत निगुणों के पास। यह न तो बहुत-से गुणो को चाहती है, और न गुणहीन के प्रति ही अनुराग रस्खती है। उत्तम गौ की भाँति, यह अन्धी लक्ष्मी कहीं-कहीं ही ठहरती हैं।
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