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विदुर नीति • अध्याय 7 • श्लोक 45
प्राज्ञोपसेविनं वैद्यं धार्मिकं प्रियदर्शनम् । मित्रवन्तं सुवाक्यं च सुहृदं परिपालयेत् ॥
जो विद्वानों की सेवा में रहने वाला वैद्य, घार्मिक, देखने में सुन्दर, मित्रो से युक्त, तथा मधुरभाषी हो, ऐसे सुहृद् की सर्वथा रक्षा करनी चाहिये।
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