न तत्परस्य सन्दध्यात्प्रतिकूलं यदात्मनः ।
सङ्ग्रहेणैष धर्मः स्यात्कामादन्यः प्रवर्तते ॥
जो अपने प्रतिकूल जान पड़े, उसे दूसरो के प्रति भी न करे। थोड़े में धर्म का यही स्वरूप है। इसके विपरीत जिसमें कामना से प्रवृत्ति होती है, बह तो अधर्म है।
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