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विदुर नीति • अध्याय 7 • श्लोक 59
क्षमेदशक्तः सर्वस्य शक्तिमान्धर्मकारणात् । अर्थानर्थौ समौ यस्य तस्य नित्यं क्षमा हिता ॥
जो शक्तिहीन है, वह तो सब पर क्षमा करे ही, जो शक्तिमान् है, वह भी धर्म के लिये क्षमा करे, तथा जिसकी नज़र में अर्थ और अनर्थ दोनों समान हैं, उसके लिये तो क्षमा सदा ही हितकरिणी होती है।
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