द्वेष्यो न साधुर्भवति न मेधावी न पण्डितः ।
प्रिये शुभानि कर्माणि द्वेष्ये पापानि भारत ॥
जिस से द्वेष हो जाता है, वह न साधु ,न विद्वान्, और न बुद्धिमान् ही जान पड़ता है। प्रियतम के तो सभी कर्म शुभ ही प्रतीत होते हैं, और शत्रु के सभी कर्म पापमय।
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