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विदुर नीति • अध्याय 7 • श्लोक 56
मङ्गलालम्भनं योगः श्रुतमुत्थानमार्जवम् । भूतिमेतानि कुर्वन्ति सतां चाभीक्ष्ण दर्शनम् ॥
मांगलिक पदार्थों का स्पर्श, चित्तवृत्तिया का निरोध, शास्त्र का अभ्यास, और सत्पुरुषों का बारम्बार दर्शन, ये सब उद्योगशीलता, कल्याणकारी हैं।
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