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अध्याय 3 — तीसरा अध्याय
विदुर नीति
77 श्लोक • केवल अनुवाद
धृतराष्ट्र ने कहा - महाबुद्धे! तुम पुनः धर्म और अर्थ से युक्त बातें कहो, इन्हें सुनकर मुझे तृप्ति नहों होती। इस विषय में तुम अद्भुत भाषण कर रहे हो।
विदुर जी बोले - कोमलता का बर्ताव, ये दोनों एक समान हैं, अथवा कोमलता के बर्ताव का सब तीर्थो में स्नान, और सब प्राणियों के साथ विशेष महत्व है।
बिभो! आप अपने पुत्र कौरव-पाण्डव, दोनों के साथ समान रूप से कोमलता का बर्ताव कीजिये। ऐसा करने से इस लोक में महान् सुयश प्राप्त करके मरने के पश्चात्, आप स्वर्ग लोक में जायँगे।
पुरुषश्रेष्ठ! इस लोक में, जब तक मनुष्य की पावन कीर्ति का गान किया जाता है, तब तक वह स्वर्गलोक में प्रतिष्ठित होता है।
इस विषय में, उस प्राचीन इतिहास का उदाहरण दिया करते हैं, जिसमें केशिनी के लिये, सुधन्वा के साथ विरोचन के विवाद का वर्णन है।
राजन्! एक समय की बात है, केशिनी नाम वाली एक अनुपम सुन्दरी कन्या, सर्वश्रेष्ठ पति को वरण करने की इच्छा से, स्वयंवर-सभा में उपस्थित हुई।
उसी समय दैल्यकुमार विरोचन, उसे प्राप्त करने की इच्छा से वहाँ आया। तब केशिनी ने वहाँ दैत्यराज से इस प्रकार बातचीत की।
केशिनी बोली - विरोचन! ब्राह्मण श्रेष्ठ होते हैं या दैत्य? यदि ब्राह्मण श्रेष्ठ होते हैं, तो सुधन्वा ब्राह्मण ही मेरी शय्या पर क्यों न बैठे? अर्थात् मैं सुधन्वा से विवाह क्यों न करूँ?
विरोचन ने कहा - केशिनी! हम प्रजापति की श्रेष्ठ संतानें हैं, अतः सबसे उत्तम हैं। यह सारा संसार हम लोगों का ही है। हमारे सामने देवता क्या हैं? और ब्राह्मण कौन चीज हैं?
केशिनी बोली - विरोचन! इसी जगह हम दोनों प्रतीक्षा करें, कल प्रातः काल सुधन्वा यहाँ आएगा, फिर मैं तुम दोनों को एकत्र उपस्थित देखूंगी।
विरोचन बोला - कल्याणि! तुम जैसा कहती हो, वही करूंगा, प्रातः काल तुम मुझे और सुधन्वा को एक साथ उपस्थित देखोगी।
विदुर जी कहते हैं - राजाओं में श्रेष्ठ धृतराष्ट्र! इसके बाद जब रात बीती, और सूर्यमण्डल का उदय हुआ, उस समय सुधन्वा उस स्थान पर आया, जहाँ विरोचन, केशिनी के साथ उपस्थित था।
भरतश्रेष्ठ! सुधन्वा प्रहाद कुमार विरोचन, और केशिनी के पास आया। ब्राह्मण को आया देख, केशिनी उठ खड़ी हुई और उसने उसे आसन, पाद्य, और अर्ध्य निवेदन किया।
सुधन्वा बोला - प्रहलादनन्दन! मैं तुम्हारे इस सुवर्णमय सुन्दर सिंहासन को केवल छू लेता हूँ, तुम्हारे साथ इस पर बैठ नहीं सकता, क्योंकि ऐसा होने से हम दोनों एक समान हो जायेंगे।
विरोचन ने कहा - सुधन्वन् ! तुम्हारे लिये तो पीढ़ा चटाई, या कुश का आसन उचित है। तुम मेरे साथ बराबर के आसन पर बैठने योग्य हो ही नहीं।
सुधन्वा ने कहा - पिता और पुत्र एक साथ एक आसन पर बैठ सकते हैं, दो ब्राह्मण, दो क्षत्रिय, दो वृद्ध, दो वैश्य, और दो शुद्र भी एक साथ बैठ सकते हैं, किन्तु दूसरे कोई दो व्यक्ति परस्पर एक साथ नहीं बैठ सकते।
तुम्हारे पिता प्रह्लाद, नीचे बैठकर ही मेरी सेवा किया करते हैं। तुम अभी बालक हो, घर में सुख से पले हो, अतः तुम्हें इन बातों का कुछ भी ज्ञान नहीं है।
विरोचन बोला - सुधन्वन्! हम असुरों के पास जो कुछ भी सोना, गौ, घोड़ा, आदि धन है, उसकी मैं बाजी लगाता हूँ, हम-तुम दोनों चलकर, जो इस विषय के जानकार हों, उनसे पूछे कि हम दोनों मे कौन श्रेष्ठ है?
सुधन्वा बोला - विरोचन! सुवर्ण, गाय, और घोड़ा तुम्हारे ही पास रहें, हम दोनों प्राणों की बाजी लगाकर, जो जानकार हों, उनसे पूछे।
विरोचन ने कहा - अच्छा, प्राणों की बाजी लगाने के पश्चात्, हम दोनों कहाँ चलेंगे? मैं न तो देवताओं के पास जा सकता हूँ, और न कभी मनुष्यों से ही निर्णय करा सकता हूँ।
प्राणों की बाजी लग जाने पर, हम दोनों तुम्हारे पिता के पास चलेंगे। मुझे विश्वास है, कि प्रह्लाद अपने बेटे के लिये भी झूठ नहीं बोल सकते हैं।
विदुर जी कहते हैं - इस तरह बाजी लगाकर, परस्पर क्रुद्ध हो विरोचन और सुधन्वा दोनों उस समय वहां गये, जहाँ प्रह्लादजी थे।
प्रहाद ने (मन-ही-मन) कहा - जो कभी भी एक साथ नहीं चले थे, वे ही दोनों, ये सुधन्वा और विरोचन, आज साँप की तरह क्रुद्ध होकर, एक ही राह से आते दिखायी देते है।
विरोचन! मैं तुमसे पूछता हूँ, क्या सुधन्वा के साथ तुम्हारी मित्रता हो गयी है? फिर कैसे एक साथ आ रहे हो? पहले तो तुम दोनों कभी एक साथ नहीं चलते थे।
विरोचन बोला - पिताजी ! सुधन्वा के साथ मेरी मित्रता नहीं हुई है। हम दोनों प्राणों की बाजी लगाये आ रहे हैं। मैं आपसे यथार्थ बात पूछता हूँ। मेरे प्रश्न का झूठा उत्तर न दीजियेगा।
प्रहलाद ने कहा - सेवको! सुधन्वा के लिये जल और मधुपर्क लाओ। फिर सुधन्वा से कहा - ब्रह्मन्! तुम मेरे पूजनीय अतिथि हो, मैंने तुम्हारे लिये सफेद गौ, खूब मोटी-ताजी कर रखी है।
सुधन्वा बाला - प्रहाद! जल और मधुपर्क तो मुझे मार्ग में ही मिल गया है। तुम तो जो मैं पूछ रहा हूँ, उस प्रश्र का ठीक-ठीक उत्तर दो, क्या ब्राह्मण श्रेष्ठ हैं अथवा विरोचन?
प्रह्लाद बोले - ब्रह्मन्! मेरे एक ही पुत्र है, और इधर तुम स्वयं उपस्थित हो, भला तुम दोनों के विवाद में मेरे जैसा मनुष्य, कैसे निर्णय दे सकता है?
सुधन्वा बोला - मतिमन्! तुम्हारे पास गौ, तथा दूसरा जो कुछ भी प्रिय धन हो, वह सब अपने औरस पुत्र विरोचन को दे दो, परंतु हम दोनों के विवाद में तो, तुम्हें ठीक-ठीक उत्तर देना ही चाहिये।
प्रह्वाद ने कहा - सुधन्वन्! अब में तुमसे यह बाते पूछता हूँ, जो सत्य न बोले, अथवा असत्य निर्णय करे, ऐसे दुष्ट वक्ता की क्या स्थिति होती है?
सुधन्वा बोला - सौत वाली स्त्री, जूए में हारे हुए जुआरी, और भार ढोने से व्यथित शरीर वाले मनुष्य की रात में जो स्थिति होती है, वही स्थिति उलटा न्याय देने वाले वक्ता की भी होती है।
जो झूठा निर्णय देता है, वह राजा नगर में कैद होकर, बाहरी दरवाजे पर भूख का कष्ट उठाता हुआ, बहुत से शत्रुओं को देखता है।
पशु के लिये झूठ बोलने से, पाँच पीढ़ियों को, गौ के लिये झूठ बोलने पर, दस पीढ़ियों को, घोड़े के लिये असत्य भाषण करने पर, सौ पीढ़ियों को, और मनुष्य के लिये झूठ बोलने पर, एक हज़ार पीढ़ियों को मनुष्य, नरक में ढकेलता है।
सोने के लिये झूठ बोलने वाला, भूत और भविष्य, सभी पीढ़ियों को नरक में गिराता है, पृथ्वी तथा स्त्री के लिये झूठ कहने वाला तो, अपना सर्वनाश ही कर लेता है, इसलिये, तुम भूमि या स्त्री के लिये कभी झुठ न बोलना।
प्रह्लाद ने कहा - विरोचन! सुधन्बा के पिता अङ्गिरा मुझसे श्रेष्ठ हैं, सुधन्वा तुम से श्रेष्ठ है, इसकी माता भी तुम्हारी माता से श्रेष्ठ है, अतः तुम आज सुधन्वा से हार गये।
विरोचन! अब सुधन्वा तुम्हारे प्राण का मालिक है। सुधन्वन्! अब यदि तुम दे दो तो, मैं विरोचन को दोबारा पाना चाहता हूं।
सुधन्वा बोला - प्रहलाद! तुमने धर्म को ही स्वीकार किया है, स्वार्थ वश झूठ नहीं कहा है, इसलिये अब इस दुर्लभ पुत्र को फिर तुम्हें दे रहा हूँ।
प्रह्लाद! तुम्हारे इस पुत्र विरोचन को, मैने पुनः तुम्हें दे दिया, किन्तु, अब यह कुमारी केशिनी के निकट चल कर मेरा पैर धोये।
विदुर जी कहते हैं - इसलिये राजेन्द्र! आप पृथ्वी के लिये झूठ न बोलें। बेटे के स्वार्थ वश सच्ची बात न कहकर, पुत्र और मन्त्रियों के साथ विनाश के मुख में न जायेँ।
देवता लोग चरवाहों की तरह डण्डा लेकर पहरा नहीं देते। बे जिसकी रक्षा करना चाहते हैं, उसे उत्तम बुद्धि से युक्त कर देते हैं।
मनुष्य जैसे-जैसे कल्याण में मन लगाता है, वैसे-ही-वैसे उसके सारे अभीष्ट सिद्ध होते हैं इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है।
कपटपूर्ण व्यवहार करने वाले, मायावी को वेद पापों से मुक्त नहीं करते, किंतु जैसे पंख निकल आने पर चिड़ियों के बच्चे घोंसला छोड़ देते हैं, उसी प्रकार वेद भी अन्त काल में उसे त्याग देते हैं।
शराब पीना, कलह, समूह के साथ वैर, पति-पत्नी में भेद पैदा करना, कुटुम्ब वालों में भेदबुद्धि उत्पनत्न करना, राजा के साथ द्वेष, स्त्री और पुरुष में विवाद, और बुरे रास्ते - ये सब त्याग देने योग्य हैं।
हस्त रेखा देखने वाला, चोरी कर के व्यापार करने वाला, जुआरी, वैद्य, शत्रु, मित्र, और नर्तक - इन सातों को कभी भी गवाह न बनाए।
आदर के साथ अग्निहोत्र, आदरपूर्वक मौन का पालन, आदरपूर्वक स्वाध्या, और आदर के साथ यज्ञ का अनुष्ठान - ये चार कर्म भय को दूर करने वाले हैं, किंतु वे ही यदि ठीक तरह से सम्पादित न हों, तो भय प्रदान- करने वाले होते हैं।
घर में आग लगाने वाला, विष देने वाला, जारज संतान की कमाई खाने वाला सोमरस बेचने वाला, इस्त्र बनाने वाला चुगली करने वाला, मित्रद्रोही, परस्त्री लम्पट,
गर्भ कों हत्या करने वाला, गुरु स्त्री गामी, ब्राह्मण होकर शराब पीने वाला, अधिक तीखे स्वभाव वाला, कौए की तरह काँय-कॉय करने वाला नास्तिक, वेद की निन्दा करने वाला,
ग्राम पुरोहित, ब्रात्य क्रूर, तथा शक्ति रहते हुए, रक्षा के लिये प्रार्थना करने पर भी, जो हिंसा करता है - ये सब के सब ब्रह्म हत्यारों के समान हैं।
जलती हुई आग से सोने की पहचान होती है, सदाचार से सत्पुरुष की, व्यवहार से साधु की, भय आनेपर शुर की, आर्थिक कठिनाई में धीर की और कठिन आपत्ति में शत्रु एवं मित्र की परीक्षा होती है।
बुढापा (सुन्दर) रूप कों, आशा रता को, मृल्यु प्राणो को, दोष देखने कों आदत धर्माचरण को, क्रोध लक्ष्मी को, नीच पुरुषों की सेवा सत्स्वभाव को, काम लज्जा को, और अभिमान सर्वस्व को नष्ट् कर देता है।
शुभ कर्मो से लक्ष्मी की उत्पत्ति होती है, प्रगल्मता से वह बढ़ती है, चतुरता से जड़ जमा लेती है, और संयम से सुरक्षित रहती है।
आठ गुण पुरुष की शोभा बढ़ाते हैं - बुद्धि, कुलीनता, दम, शास्त्रज्ञान, पराक्रम, बहुत न बौलना, यथाशक्ति दान देना, और कृतज्ञ होना।
तात! एक गुण ऐसा है, जो इन सभी महत्त्वपूर्ण गुणों पर हठात् अधिकार जमा लता है। जिस समय राजा किसी मनुष्य का सत्कार करती है, उस समय यह एक ही गुण (राज सम्मान), सभी गुणों से बढ़कर शौभा पाता है।
राजन्! मनुष्य लोक मे ये आठ गुण स्वर्गलोक का दर्शन करानेवाले हैं, इनमे से चार तो संतो के साथ नित्य सम्बद्ध हैं, उनमें सदा विद्यमान रहते हैं। और चार का सज्जन पुरुष अनुसरण करते हैं।
यज्ञ, दान, अध्ययन, और तप - ये चार सजनों के साथ नित्य सम्बद्ध हैं, और इन्द्रिय निग्रह, सत्य, सरलता तथा कोमलता, इन चारों का संत लोग अनुसरण करते हैं।
यज्ञ, अध्ययन, दान, तप, सत्य, क्षमा, दया और अलोभ, ये धर्म के आठ प्रकार के मार्ग बताये गये हैं।
इनमें से पहले चारों का तो दम्भ के लिये भी सेवन किया जा सकता है, परंतु अन्तिम चार तो, जो महत्मा नहीं है, उनमें रह ही नहीं सकते।
जिस सभा में बड़े-बूंढ़े नहीं, वह सभा नहीं, जो धर्मकी बात न कहें, वे बूढ़े नहीं, जिसमें सत्य नहीं, वह धर्म नहीं, और जो कपट से पूर्ण हो, वह लत्य नहीं है।
सत्य, विनय का भाव, शास्त्रज्ञान, विद्या, कुलीनता, शील, बल, धन, शरता, और चमत्कारपूर्ण बात कहना, ये दस स्वर्ग के साधन हैं।
पाप कीर्ति वाला मनुष्य पापाचरण करता हुआ, पाप रूप फल को ही प्राप्त करता है, और पुण्यकर्मा मनुष्य, पुण्य करता हुआ अत्यन्त पुण्य फल का ही उपभोग करता है।
इसलिये प्रशंसित व्रत का आचरण करने वाले पुरुष को पाप नहीं करना चाहिये, क्योंकि बारम्बार किया हुआ पाप, बुद्धि को नष्ट कर देता है।
जिसकी बुद्धि नष्ट हो जाती है, वह मनुष्य सदा पाप ही करता रहता है। इसी प्रकार बारम्बार किया हुआ पुण्य बुद्धि को बढ़ाता है।
जिसकी बुद्धि बढ़ जाती है, वह मनुष्य सदा पुण्य ही करता है। इस प्रकार पुण्यकर्मा मनुष्य पुण्य करता हुआ, पुण्यलोक को ही जाता है। इसलिये मनुष्य को चाहिये, कि वह सदा एकाग्रचित्त होकर पुण्य का ही सेवन करे।
गुणो में दोष देखने वाला, मर्म पर आधात करने वाला, नि्देयी, शत्रुता करने वाला, और शठ मनुष्य पाप का आचरण करता हुआ, शीघ्र ही महान् कष्ट को प्राप्त होता है।
दोष दृष्टि से रहित, शुद्ध बुद्धिवाला पुरुष, सदा शुभ कर्मों का अनुष्ठान करता हुआ, महान् सुख को प्राप्त होता है, और सर्वत्र उसका सम्मान होता है।
जो बुद्धिमान् पुरुषों से सद्बुद्धि प्राप्त करता है, वही पण्डित है, क्योंकि बुद्धिमान् पुरुष ही धर्म, और अर्थ को प्राप्त कर, अनायास ही अपनी उन्नति करने में समर्थ होता है।
दिनभर में ही वह कार्य कर ले, जिससे रात में सुख से रह सके, और आठ महीनों में वह कार्य कर ले, जिससे वर्षा के चार महीने सुख से व्यतीत कर सके।
पहली अवस्था में वह काम करे, जिससे वृद्धावस्था में सुख पूर्वक रह सके, और जीवन भर वह कार्य करे, जिससे मरने के बाद भी सुख से रह सके।
सज्जन पुरुष पच जाने पर अन्नकी, निष्कलढ़ जवानी बीत जाने पर स्त्री की, संग्राम जीत लेने पर शूर की, और तत्त्व ज्ञान प्राप्त हो जाने पर तपस्वी की प्रशंसा करते हैं।
अधर्म से प्राप्त हुए धन के द्वारा जो दोष छिपाया जाता है, वह तो छिपता नहीं, उससे भिन्न और नया दोष प्रकट हो जाता है।
अपने मन और इन्द्रियों को वश में करने वाले शिष्यों के शासक, गुरु हैं, दुष्टों के शासक राजा हैं, और छिपे-छिपे पाप करने वालों के शासक सूर्य पुत्र यमराज हैं।
ऋषि, नदी, महात्माओं के कुल, तथा स्त्रियों के दुश्चरित्र का मूल नहीं जाना जा सकता।
राजन् ! ब्राह्मणों की सेवा-पूजा में संलग्र रहने वाला, दाता, कुटुम्बीजनों के प्रति कोमलता का बर्ताव करने वाला, और शीलवान् राजा चिरकाल तक पृथ्वी का पालन करता है।
शर, विद्वान् और सेवाधर्म को जानने वाले, ये तीन प्रकार के मनुष्य, पृथ्वी से सुवर्णरूपी पुष्प का सञ्चव करते हैं।
भारत! बुद्धि से विचारकर किये हुए कर्म श्रेष्ठ होते हैं, बाहुबल से किये जाने वाले कर्म मध्यम श्रेणी के हैं, जांघों से होने वाले कार्य अधम हैं, और भार ढोने का काम महान् अधम है।
राजन्! अब आप दुर्योधन, शकुनि, मूर्ख दुशासन, तथा कर्ण पर राज्य का भार रखकर उन्नति कैसे चाहते हैं?
भरतश्रेष्ठ! पांडव तो सभी उत्तम गुणों से संपन्न हैं, और आप में पिता का सा भाव रख कर व्यवहार करते हैं, आप भी उनपर पुत्र भाव रखकर, उचित व्यवहार कीजिये।
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धर्म का अन्वेषण
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