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विदुर नीति • अध्याय 3 • श्लोक 1
धृतराष्ट्र उवाच । ब्रूहि भूयो महाबुद्धे धर्मार्थसहितं वचः । शृण्वतो नास्ति मे तृप्तिर्विचित्राणीह भाषसे ॥
धृतराष्ट्र ने कहा - महाबुद्धे! तुम पुनः धर्म और अर्थ से युक्त बातें कहो, इन्हें सुनकर मुझे तृप्ति नहों होती। इस विषय में तुम अद्भुत भाषण कर रहे हो।
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