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विदुर नीति • अध्याय 3 • श्लोक 66
प्रज्ञामेवागमयति यः प्राज्ञेभ्यः स पण्डितः । प्राज्ञो ह्यवाप्य धर्मार्थौ शक्नोति सुखमेधितुम् ॥
जो बुद्धिमान् पुरुषों से सद्बुद्धि प्राप्त करता है, वही पण्डित है, क्योंकि बुद्धिमान् पुरुष ही धर्म, और अर्थ को प्राप्त कर, अनायास ही अपनी उन्नति करने में समर्थ होता है।
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