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विदुर नीति • अध्याय 3 • श्लोक 64
असूयको दन्द शूको निष्ठुरो वैरकृन्नरः । स कृच्छ्रं महदाप्नोतो नचिरात्पापमाचरन् ॥
गुणो में दोष देखने वाला, मर्म पर आधात करने वाला, नि्देयी, शत्रुता करने वाला, और शठ मनुष्य पाप का आचरण करता हुआ, शीघ्र ही महान् कष्ट को प्राप्त होता है।
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