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विदुर नीति • अध्याय 3 • श्लोक 10
केशिन्युवाच । इहैवास्स्व प्रतीक्षाव उपस्थाने विरोचन । सुधन्वा प्रातरागन्ता पश्येयं वां समागतौ ॥
केशिनी बोली - विरोचन! इसी जगह हम दोनों प्रतीक्षा करें, कल प्रातः काल सुधन्वा यहाँ आएगा, फिर मैं तुम दोनों को एकत्र उपस्थित देखूंगी।
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