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विदुर नीति • अध्याय 3 • श्लोक 15
विरोचन उवाच । अन्वाहरन्तु फलकं कूर्चं वाप्यथ वा बृसीम् । सुधन्वन्न त्वमर्होऽसि मया सह समासनम्॥
विरोचन ने कहा - सुधन्वन् ! तुम्हारे लिये तो पीढ़ा चटाई, या कुश का आसन उचित है। तुम मेरे साथ बराबर के आसन पर बैठने योग्य हो ही नहीं।
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