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विदुर नीति • अध्याय 3 • श्लोक 70
धनेनाधर्मलब्धेन यच्छिद्रमपिधीयते । असंवृतं तद्भवति ततोऽन्यदवदीर्यते ॥
अधर्म से प्राप्त हुए धन के द्वारा जो दोष छिपाया जाता है, वह तो छिपता नहीं, उससे भिन्न और नया दोष प्रकट हो जाता है।
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