अनसूयः कृतप्रज्ञ्टः शोभनान्याचरन्सदा ।
अकृच्छ्रात्सुखमाप्नोति सर्वत्र च विराजते ॥
दोष दृष्टि से रहित, शुद्ध बुद्धिवाला पुरुष, सदा शुभ कर्मों का अनुष्ठान करता हुआ, महान् सुख को प्राप्त होता है, और सर्वत्र उसका सम्मान होता है।
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