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विदुर नीति • अध्याय 3 • श्लोक 42
न छन्दांसि वृजिनात्तारयन्ति आयाविनं मायया वर्तमानम् । नीडं शकुन्ता इव जातपक्षाश् छन्दांस्येनं प्रजहत्यन्तकाले ॥
कपटपूर्ण व्यवहार करने वाले, मायावी को वेद पापों से मुक्त नहीं करते, किंतु जैसे पंख निकल आने पर चिड़ियों के बच्चे घोंसला छोड़ देते हैं, उसी प्रकार वेद भी अन्त काल में उसे त्याग देते हैं।
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