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विदुर नीति • अध्याय 3 • श्लोक 49
तृणोक्लया ज्ञायते जातरूपं युगे भद्रो व्यवहारेण साधुः । शूरो भयेष्वर्थकृच्छ्रेषु धीरः कृच्छ्रास्वापत्सु सुहृदश्चारयश् च ॥
जलती हुई आग से सोने की पहचान होती है, सदाचार से सत्पुरुष की, व्यवहार से साधु की, भय आनेपर शुर की, आर्थिक कठिनाई में धीर की और कठिन आपत्ति में शत्रु एवं मित्र की परीक्षा होती है।
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