सुधन्वा च समागच्छत् प्रहलादि केशिनीं तथा।
समागतं द्विजं दृष्ट्वा केशिनी भरतर्वभ ।
प्रत्युत्थायासनं तस्मै पाद्यमव्य ददौ पुनः ॥
भरतश्रेष्ठ! सुधन्वा प्रहाद कुमार विरोचन, और केशिनी के पास आया। ब्राह्मण को आया देख, केशिनी उठ खड़ी हुई और उसने उसे आसन, पाद्य, और अर्ध्य निवेदन किया।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
विदुर नीति के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
विदुर नीति के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।