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विदुर नीति • अध्याय 3 • श्लोक 61
पापं प्रज्ञां नाशयति क्रियमाणं पुनः पुनः । नष्टप्रज्ञः पापमेव नित्यमारभते नरः ॥
इसलिये प्रशंसित व्रत का आचरण करने वाले पुरुष को पाप नहीं करना चाहिये, क्योंकि बारम्बार किया हुआ पाप, बुद्धि को नष्ट कर देता है।
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