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विदुर नीति • अध्याय 3 • श्लोक 54
अष्टौ नृपेमानि मनुष्यलोके स्वर्गस्य लोकस्य निदर्शनानि । चत्वार्येषामन्ववेतानि सद्भिश् चत्वार्येषामन्ववयन्ति सन्तः ॥
राजन्! मनुष्य लोक मे ये आठ गुण स्वर्गलोक का दर्शन करानेवाले हैं, इनमे से चार तो संतो के साथ नित्य सम्बद्ध हैं, उनमें सदा विद्यमान रहते हैं। और चार का सज्जन पुरुष अनुसरण करते हैं।
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