पुण्यं प्रज्ञां वर्धयति क्रियमाणं पुनः पुनः ।
वृद्धप्रज्ञः पुण्यमेव नित्यमारभते नरः ॥
जिसकी बुद्धि नष्ट हो जाती है, वह मनुष्य सदा पाप ही करता रहता है। इसी प्रकार बारम्बार किया हुआ पुण्य बुद्धि को बढ़ाता है।
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