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विदुर नीति • अध्याय 3 • श्लोक 77
सर्वैर्गुणैरुपेताश्च पाण्डवा भरतर्षभ । पितृवत्त्वयि वर्तन्ते तेषु वर्तस्व पुत्रवत् ॥
भरतश्रेष्ठ! पांडव तो सभी उत्तम गुणों से संपन्न हैं, और आप में पिता का सा भाव रख कर व्यवहार करते हैं, आप भी उनपर पुत्र भाव रखकर, उचित व्यवहार कीजिये।
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