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अध्याय 13 — त्रयोदश अध्याय

शिवभारतम्
99 श्लोक • केवल अनुवाद
पण्डित बोले - शत्रुओं ने अपने पिता को कैद कर लिया है, ऐसा सुनकर संभाजी और शिवाजी ने क्या किया? उस शाहजी राजा को कैद करके सेनापति मुस्ताफाखान और दुष्ट अधार्मिक महमूदशाह ने क्या किया?
कवीन्द्र बोले - अपने पिता को शत्रुओं ने पकड़ लिया है, ऐसा सुनकर बैंगलोर में रहने वाले संभाजी, मुस्तफाखान पर अतिशय क्रोधित हुए।
प्रतापी शिवाजी ने भी शाहजी राजा की इस अवस्था सुनकर आदिलशाह से प्रतिशोध लेने की प्रतिज्ञा की।
अभिमानी मुस्तफखान ने बैंगलोर को त्वरित अधिग्रहीत करने की इच्छा से डूरे वंश के प्रमुख तानाजी राजा को एवं क्षत्रियवृत्ति से रहने वाले ब्राह्मण विठ्ठल गोपाल को तथा प्रौढ फरादखान को शीघ्र प्रस्थान करने का आदेश दिया।
उस समय बुद्धिमान् महमूशाह ने भी शिवाजी के प्रान्त पर आक्रमण करने की अपने सेनापतियों को आज्ञा दी।
तत्पश्चात् महामना फतेखान नाम का सेनापति, मिनादशेख एवं रतनशेख, क्रोधित फतेखान, क्रूर, धनुर्धारी एवं यशस्वी शरफशाह ये सभी कवचधारी एवं साधन सुविधाओं से सज्ज यवन तथा वज्र जैसे जिसके बाण हैं, ऐसा मदमस्त घाटगे, फलटण का राजा बाजनाईक एवं सेना के धनुष है पीठ पर जिसके ऐसे स्वर्णकटिबंदो से युक्त, स्वर्ण वस्त्रों से युक्त, स्वर्ण ध्वजाओं से युक्त, स्वर्ण एवं चादी से युक्त ढालों को धारण करने वाले अन्य सैकड़ों सामन्त राजाओं ने बेलसर नाम का शहर बलात अधीन करके वहीं स्थित हो गये।
उसी प्रकार उत्तम धनुर्धर, युद्धकुशल, क्रूर, सुन्दर, मानो दूसरा अश्वत्थामा ऐसा हैबत राजा का पुत्र बल्लाल नाम वाला वह अनेक सैनिकों के साथ शिवाजी के सैनिकों के अवरोध से रहित होकर शिरबल पहुंच गया।
तब वह उसके आगमन को सुनकर पुरन्दर किले पर रहने वाले, इन्द्र की तरह वह शिवाजी कवच पहनकर धनुष, बाण को हाथ में लेकर, सभी साधनों से सज्ज होकर, हंसमुख एवं विनम्नवदन वह शिवाजी बलराम की तरह अपने धैर्यवान् सैनिकों को यह बोला।
शिवाजी बोला - मेरा पिता शाहजी राजा स्वयं की सम्पत्ति से सम्पन्न होते हुए भी मुस्तुफाखान पर विश्वास करने के कारण से वे विपत्ति में फंस गये हैं, यह कितने दुःख का वृतान्त है?
अविश्वासी लोगों पर विश्वास नहीं करना चाहिए और विश्वस्त लोगों पर भी विश्वास नहीं करना चाहिए, क्योंकि विश्वास के कारण से उत्पन्न भय व्यक्ति का समूल नाश कर देता है।
इस व्यासवचन को जानते हुए भी राजा ने उस अत्यन्त अविश्वासी व्यक्ति पर विश्वास किया, यह कितना बढ़ा आक्षर्य है?
अपने मनोगत को अज्ञात रखने वाले अधम यवन मुस्तुफाखान ने आदिलशाह के आदेश से महाराज शहाजी को कैद कर लिया।
वह दाशरथी राम भी मृगनयना सीता के आग्रह से स्वर्ण हिरण पर विश्वास करके रावण के द्वारा फंसाया गया।
नहुष के पुत्र ययाति का, इन्द्र ने अपने ऊपर अत्यधिक विश्वास करवाकर उसे फंसा दिया तो वह स्वर्ग से शीघ्र ही नीचे गिर गया।
जन्मतः प्राप्त हुए कवच को धारण करने वाले कर्ण के विश्वास करने के कारण ही इन्द्र ने उसे ऐसा बनाया, कि जिससे उसे अर्जुन मार सके।
भरत कुल का धुरन्धर धर्मराज युधिष्ठिर भी विश्वस्तता के कारण ही दुर्योधन के सहयोगी शकुनी के द्वारा जीत लिया गया।
इसलिए जिसने लक्षणों सहित राजनीति का अच्छी तरह अध्ययन किया है, ऐसे चतुर पुरुषों को शत्रु पर विश्वास नहीं करना चाहिए।
सांप को पकड़ना, हलाहल विष का पान करना एवं शत्रु पर विश्वास करना ये तीनों वृतान्त समान ही हैं।
बंदर के बच्चों का लालन-पालन करना, काले सांप को छोड़ना वैसे ही दोस्तों के साथ मित्रता करना अहितकारक होता है।
जैसे अंधे व्यक्ति के घर के प्रांगण के मध्य दीपक का जलाना, जैसे नदी के प्रवाह में रेत का सेतु बनाना, जैसे टूटे हुए मूल्यवान मोतियों को पुनः जोड़ना, जैसे केले के खंभे को गिराना संसार में प्रसिद्ध है, जैसे आकाश को खोजना, जैसे पानी को मारना जैसे यह सब केवल परिश्रम के कारणीभूत होते हैं, वैसे ही दुष्टो की सेवा करना होता है।
शत्रु पर विश्वास करके जिसका पूर्णतया राजनीति शास्त्र विस्मृत हो गया है, उसका क्या उपयोग है? क्या उसने खदिर के अंगारे से युक्त पलंग पर शयन किया हैं?
प्यासे व्यक्ति की प्यास यदि मृगतृष्णा को पीकर शांत हो जाए तो दुष्टो की सेवा से भी संपूर्ण कल्याण होगा।
दोषदर्शी शत्रु, दूसरे के साथ स्पर्धा करने वाला दुष्ट, इनको सांप से भी अधिक अहितकारी जानना चाहिए, जानते हुए भी इनकी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए।
उस महमूद शाह के संपूर्ण राज्य की रक्षा की एवं उसकी आज्ञाओं का पालन किया, ऐसे इस महाराज ने क्या अनर्थ किया?
मित्रों के शत्रु हो जाने से आश्रयरहित यह आदिलशाह अपने ऐश्वर्य की शोभा से महान होते हुए भी विनाश को प्राप्त नहीं हो रहा है, क्या यह आश्चर्य नहीं है?
बेंगलुरु में रहने वाला, अशदखान आदि शत्रुओं के द्वारा गिरा हुआ अत्यंत स्वाभिमानी मेरा भाई वहां युद्ध करेगा।
और इन गिरिदुर्गों की रक्षा करते हुए मैं अत्यंत निर्भयता पूर्वक सज्ज सेना से युक्त होकर यहां शत्रुओं से लडूंगा।
इधर मैं स्वयं और उधर पराक्रमी संभाजी, इस प्रकार दोनों युद्ध करके पिता को मुक्त करेंगे।
अत्यन्त अभिमानी महमूदशाह के हमारे से पराजित हो जाने से वह अपने घमंड के साथ ही महाराज को भी मुक्त कर देगा।
स्वधर्म में निष्ठा रखने वाले हमारे पिताजी को, यदि महमूदशाह छोडेगा नहीं तो वह अपने कर्मों का फल स्वयं भोगेगा।
यदि आदिलशाह मूर्खता के कारण महाराज पर प्रहार करेगा तो पिता जी स्वयं ही उसके सहयोगी सहित उसको मार देंगे।
जिनके मन सदा धर्मपाश के बंधन से बद्ध है, उनको कारागृह आदि बंधन बांधने में समर्थ नहीं होते हैं।
लोगों में प्रसिद्ध जयवल्ली, मैंने पहले ग्रहण की और फिर उसके इच्छुक चंद्रराव को यहां स्थापित कर दिया।
नाग के समान क्रोधित हुआ भयंकर घोरपड़े, मुझ विषहारी वैद्य को देखकर अत्यन्त शान्ति को प्राप्त हो गया।
युद्ध के लिए अचानक आक्रमण करने वाले फलटण के राजा को पहले मैंने वापस भगा दिया था और उसको जीवित पकड़कर छोड़ दिया था।
अब ये फतेखान आदि संगठित सैनिक हमारे साथ मदमस्त हाथी के समान युद्ध करेंगे।
विशाल सैन्यबल से युक्त यह बलशाली बल्लाल शिरबल को अधिग्रहित करने के कारण स्वयं को अत्यधिक बलवान् समझ रहा है।
अतः तुम यहां से जल्दी जाकर उस अत्यधिक बलशाली बल्लाल को पकड़कर, आज ही शिरबल को उससे मुक्त कर दो।
फिर, कल या परसों उस बलवान् फत्तेखान के साथ हम यहां या वहां उसके साथ युद्ध करेंगे।
कवीन्द्र बोले - शिवाजी के इन वचनों को सुनकर उसके हजारों सैनिकों ने शेर की तरह प्रचंड गर्जना करके आकाश को गूंजायमान कर दिया।
शत्रुओं का विध्वंस करने वाला, व्यूह युद्ध में आनन्दित होने वाला, महायोद्धा गोदाजी जगताप, मानो दूसरा भीम ही हो ऐसा भयंकर भीमाजी वाघ, शत्रुओं के बाहुबल के अभिमान का नाश करने वाला संभाजी काटे, यमराज की तरह भयंकर युद्धों के अंगों का श्रृंगार, जिसके भाले का अग्रभाग उठा हुआ है ऐसा शिवाजी इंगळे, शत्रुओं की लक्ष्मी का हरण करने वाला, युद्धकार्य में अत्यन्त निर्भय, अत्यन्त भीषण सैन्यबल से युक्त ऐसा सेनापति भीकाजी चोर, शत्रुओं की पीड़ा को बढ़ाने वाला, युद्ध में भैरव की तरह भयंकर, वह भैरव नाम वाला, वह इसका सगा भाई सूर्य के समान तेजस्वी था, अपने-अपने शोभा से शोभायमान इन शूरवीरों ने सैनिकों के स्वामी शिवाजी को प्रणाम करके प्रस्थान किया।
जिस प्रकार श्रीकृष्ण ने सात्यकी को यादव वीरों का सेनापति नियुक्त किया, उसी प्रकार शिवाजी ने काबुकजी को उन सबका सेनापति नियुक्त किया था।
अपनी युद्ध सामग्री को लेकर, अतिशय सज्ज घोड़े पर बैठकर बादल की तरह गर्जना करते हुए वे पुरंदर किले के नीचे उतर गये और रात्रि वही पर व्यतीत करके शत्रु को जीतने के इच्छुक वे सब प्रस्थान अभिमुख होकर, उन्होंने ढोल बजवाया।
तत्पश्चात् पदातियों के पैरों से मानों भूतल को विदीर्ण करते हुए घोड़ों के खुरों से मानों आकाश को काटते हुए शत्रुओं पर मानो प्रलयाग्नि को बिखेरते हुए उन शूरवीरों ने शीघ्र ही शिरबल को देख लिया अर्थात् पहुंच गए।
शिवाजी के बलशाली सेना को समीप आया हुआ देखकर शत्रु भी अपनी सेना में से अत्यन्त बुद्धिमान पदातियों से इस प्रकार बोला।
बल्लाल बोला - शत्रु की अत्यन्त अभिमानी सेना को देखकर मत डरो, युद्ध में मृत्यु श्रेष्ठ होती है किंतु युद्ध से पलायन निन्दनीय होता।
फत्तेखान की आज्ञा से हम शिरबल आये हैं, इस स्थान पर हमारा निवास ध्रुव तारे की तरह निश्चित है।
यदि तुम अब भी भयभीत हो तो मुझे दूसरा तट समझकर, मेरा शीघ्र ही आश्रय लेकर और मेरी आज्ञा से यहां निवास करो।
केवल हमारी मृत्यु से ही स्वामिकार्य की सिद्धि नहीं होती है। इसलिए बड़े युद्ध के लिए इस परिखा का ही आश्रय लेंगे।
भाग्य दैववश आई हुई इस अत्यन्त दुर्गम परिस्थिति में यह अत्यन्त छोटी परिखा भी इस युद्ध में हमारी सिद्धि को प्राप्त करा देगी।
हम अभिमानी लोगों को अभिमान के साथ इस शिरबल स्थान पर लड़ते-लड़ते अपने शिर को देना चाहिए किन्तु शत्रु को युद्ध में यश नहीं देना चाहिए।
यश प्राप्ति के लिए राम ने अपनी पत्नी को छोड़ दिया, यशप्राप्ति के लिए राक्षसों का राजा बली पाताल चला गया, यशप्राप्ति के लिए ही शिवि राजा ने अपने मांस के टुकड़े करके दिये, यश के लिए ही शंकर ने हलाहल विष को पी लिया, यश के लिए ही दधीचि ने अपनी ह‌ड्डियां दी एवं सङ्गति को प्राप्त हो गये, यश के लिए ही परशुराम ने सम्पूर्ण पृथ्वी को छोड़ दिया था, यशप्राप्ति के लिए ही भीष्म शरशय्या पर सोये थे, इसलिए आज जब तक इनमें से प्रमुख- प्रमुख लोगों को चुनकर मारेंगे नहीं तब हम यश के लिए और धन के लिए शत्रुओं के साथ युद्ध करते रहेंगे।
इस प्रकार बल्लाल के कहने पर उसके हजारों सैनिक किले का आश्रय लेकर हाथी के समान गर्जना करने लगे।
शत्रुओं ने परिखा का आश्रय लिया है, ऐसा देखकर युद्ध के इच्छुक काबुक ने अपने सैनिकों से इस प्रकार कहा।
काबुक बोला - अरे! शिवाजी के प्रान्त को जीतने की इच्छा से आया हुआ। यह बलवान् बल्लाल परिखा का आश्रय लेकर स्थित है।
अपने इस शिरबल का आश्रय लेकर रहने वाला यह मंदमति अपनी बुद्धिमत्ता का प्रदर्शन कर रहा है।
इस किले का वैसा अट्ट भी नहीं और न हीं वैसी परिखा है। इसलिए अरे सैनिकों! यह दुर्ग दुर्गम है, ऐसा मत समझो।
इसको घेर लो, इसके चारों ओर से मार्ग को रोक दो और एक मिनिट में सम्पूर्ण परिखाओं को भर दो।
पक्षिओं की तरह घोड़ों को उंचा कूदाकर ले लो या फिर इसे कुदाल से फोड दो।
इसको खोद दो एवं इसके बाद शीघ्र ही इसके नींव को भी खोद दो। यह दुर्ग क्या कोई लंका है? जिससे भय प्रतीत हो।
काबुक के इस प्रेरणादायक वचनों से युद्ध के लिए उत्सुक सैनिकों ने शीघ्र ही उस दुर्ग पर चारों ओर से आक्रमण कर दिया।
देवों की तरह पराक्रमी उन वीरों को सम्मुख देखकर युद्ध का आरम्भ हो गया है, ऐसा मानकर शत्रु भी धनुष चलाने लगे।
ऊपर से इनको देखने के लिए जो सिर उन्नत करता था उसका सिर शीघ्र ही काट दिया जाता था और वह केतु ग्रह जैसा हो जाता था।
वृक्षों की शाखाओं से जैसे भंवरों की संपूर्ण पंक्ति उड़ जाती है वैसे ही शूरवीरों के धनुष से तीक्ष्ण बाण निकलने लगे।
क्रूर बलशाली शूरवीर धनुष को कान तक खींच कर अपने तीक्ष्ण बाणों से शत्रुओं के सिरों को काटने लगे।
उत्कृष्ट धनुर्धरों द्वारा छोड़े गए एवं पृथ्वी पर गिरने वाले बाण उनके पेट में इतनी तेजी से घुसते थे कि तत्क्षण ही उनको शेषराज का दर्शन हो जाता था।
रथ के चक्के, हल, मुसल, ऊखल, पत्थर, घरह, जलता हुआ कोयला, खजूर के अंगारों का ढेर, तपा हुआ तेल एवं अनेक प्रकार के शस्त्र, परिखा में बैठे हुए लोग शत्रुवीरों पर फेंकने लगे।
शत्रुओं के द्वारा मारे जाने पर भी शस्त्रों को उठाए हुए शिवाजी के सैनिकों से घिरा हुआ वह किला अत्यधिक सुशोभित होने लगा।
तत्पश्चात दीर्घ गदाओं से एवं लोहबद्ध इंडों से कुछ क्रोधित सैनिकों ने अनेक स्थानों से उस किले को विदीर्ण कर दिया।
कुछ सैनिकों ने भाले के प्रहारों से छिद्र कर दिए, कुछ ने चोटी पर चढ़कर उनकी दीवारों को तोड़ दिया।
गरुढ़ की तरह वेगवान घोड़ों पर बैठे हुए कुछ सैनिक चारों ओर अच्छी तरह देख कर उन पर कूदकर जाने का प्रयास करने लगे।
काबुक ने तो गधा आदि अनेक प्रकार के शस्त्रो के द्वारा अनेक स्थान पर प्रहार करके नगर के द्वार को तोड़ दिया।
जब वह वीर टूटे हुए, नगरद्वार के प्रकार में घुस गया तब आदिलशाह की सेना उसके साथ उस समय युद्ध करने लगी।
वडवाग्नि की तरह अत्यंत स्वच्छंदता से आए हुए शत्रुओं को देखकर वडवाग्नि की तरह यह बलवान बल्लाल शत्रु पक्ष का प्रतिकार करते हुए सुशोभित होने लगा।
दर्शनीय उन्नत कवच धारण किया हुआ युवा, भाला एवं धनुष को धारण करने वाला, धैर्यवान सैनिकों से घिरा हुआ, ऊंचे घोड़े पर बैठा हुआ वह बल्लाल जैसे बुझता हुआ दीपक अत्यधिक प्रकाशित होता है वैसे वह सुशोभित होने लगा।
तत्पश्चात काबुक के नेतृत्व में भी काजी, भीमाजी, तोकाजी, गोदाजी, सदोजी, संभाजी और दूसरे सैनिक भी अपने उन्नत घोड़ों को वेग से कूदाते हुए एवं अपने चपल शस्त्रो से बल्लाल आदि वीरों पर अतिशय क्रोध से प्रहार करने लगे।
उस समय द्वेषरूपी काले अंधकार के मध्य दोनों पक्षों के योद्धाओं के शस्त्रो का एक दूसरे पर प्रहार होने लगा।
युद्ध के आवेश में एक दूसरे पर प्रहार करने वाले गरुड़ से भी अधिक वेगवान घोड़े पर बैठे हुए योद्धाओं के शस्त्र, आकाशीय विद्युत जिस तरह परस्पर टकराती है उसी प्रकार सैकड़ों शस्त्र टकराए।
स्वयं के टुकड़े होते समय, भालाधारी भालाधारी को, धनुर्धारी धनुर्धारी को, गदाधारी गदाधारी को मारने लगा।
ढालधारी ने ढाल से रहित के साथ, कवचधारी ने कवच रहित के साथ एवं धनुर्धर ने धनुष से रहित के साथ इस युद्ध में युद्ध नहीं किया।
कवच को छिन्न-भिन्न करने में असमर्थ होने से शीघ्र ही ऊपर उड़े हुए वह बाण सूर्य की किरणों की तरह क्षणभर आकाश में चमके।
कवचधारी योद्धाओं को छिन्न-भिन्न करके जब बाण पृथ्वी में घुस गए तब उनके शरीर से रक्त की धारा अविरल होकर बहने लगी।
वहां पर क्रोधित धनुर्धरों के द्वारा छोड़े गए बाणों से सिर धड़ से अलग हो गए एवं गिरते हुए रक्त से रक्त रंजित शरीर धरती पर गिर गए।
तत्पश्चात हाथी की लंबी सूंड एवं बाणों से जिसके शरीर के टुकड़े हो गए हैं ऐसे घोड़ों की गर्दनं टूटकर भूमि पर गिरने लगी।
शूर धनुर्धरों के बाणों के द्वारा तोड़े गये शत्रुओं के अनेक सिर युद्धभूमि पर फैल गए।
युद्धरूपी सागर से समीप आये हुए किसी गदाधारी रूपी मगरमच्छ को, किसी ने चतुरता से समीप जाकर जोर से पकड़ लिया।
वहाँ पर जो अपने एक कटे हुए हाथ को नहीं जान पाया, वह एक ही हाथ से हाथी के समान शत्रुओं पर प्रहार कर रहा था। उस स्थान पर इंगळे ने पच्चीस को, पोल ने बारह को, चोर ने चौदह को, उसी प्रकार घाटगे ने तेईस को, वाघ ने सोलह को इस प्रकार क्षणभर में ही वीरों को मार दिया एवं काबुक ने उन्नीस उत्कृष्ट योद्धाओं को मार दिया था।
तब वहाँ पर पदातियों, घोड़ों एवं हाथी के शरीर से निकलने वाली रक्त की नदी वेग से बहने लगी।
जब शत्रुवीरों ने बलपूर्वक पराजित करके घेर लिया तब बल्लाल की सेना भयभीत होकर युद्धभूमि से पलायन करने लगी।
शत्रुओं के द्वारा वापस लौटाएं गए एवं विचलित होकर पलायन करने वाली सेना को हैवत राजा का पुत्र नियन्त्रित नहीं कर सका।
तब वह अत्यधिक क्रोधित होकर, अपने शस्त्रों को उठाकर जैसे वृत्रासर ने क्रोध से देवों पर प्रहार किया, उसी प्रकार शत्रु पर उसने प्रहार किया।
उसके तूणीर युगल में जितने बाण थे उनसे उतने ही काबुक के अग्रणी वीरों को मार दिया।
वह जो भाला लेकर शत्रुओं को चारों ओर से पीडित कर रहा था, उसको ही काबुक ने अपने भाले के प्रहार से गिरा दिया।
सिंह जैसे मदमस्त हाथी को गिराता है, उसी प्रकार अभिमान से युद्ध करने वाले उस शिवाजी के सेनापति के द्वारा हैबत राज के पुत्र को गिरा देने पर रक्त मेद, चर्बी एवं मांस इन सबका भूमि पर कीचड़ हो गया। उसके बाद उसकी सेना में कोई भी धैर्य धारण करने वाला स्वामी नहीं था।
उस समय दांतों में तिनका दबाकर शरण में आये हुए सैकड़ों लोगों को उस स्वाभिमानी काबुक ने मुक्त कर दिया और वे स्वछन्दता से चले गए।
अतिशय क्रोधित कुछ लोगों ने अभिमानपूर्वक युद्ध किया और बाणों से उनके तुकडे होकर वे स्वर्गवासी हो गये।
किसी के पैर टुटकर, किसी के हाथ टुटकर, किसी के कवच खण्डशः होकर, किसी की छाती भिन्न होकर, किसी की रीढ़ की हड्‌डी टुटकर, तो किसी की कोहनी फुटकर, वे करुणा जनक आवाज निकालकर पृथ्वी पर लुढक-लुढकर मूर्च्छित हो गये।
फिर उस शत्रु के रणभूमि पर गिरने के बाद, हाथी, उन्नत घोडे, अनेक प्रकार के आभूषण, रंगबिरंगे वख, कवच, शस्त्रास्त्र, पालकियां, कोष और दूसरे सामान को भी लेकर अत्यंत आनंदित होकर काबुक आदि उत्कृष्ट योद्धा शिवाजी से मिलने के लिए पुरंदर किले पर चले गये।
शत्रुवीरों को मारकर अपने कार्य को शीघ्र ही पूर्ण करके उत्तम हाथी, घोडे, विपुल स्वर्ण, मोतियों की माला एवं रत्नों को अर्पित करके सिर झुकाकर काबुल आदि सैनिकों ने शिवाजी को प्रणाम किया।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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