तत्रान्याच्छिभमेकं यः स्वं हस्तं नावबुद्धवान् ॥ स एकेनैव हस्तेन हस्तीवाभिययौ परान् ॥ पञ्चविंशतिमिंगालः पोलः पंच च सप्त च ।। चोरश्चतुर्दश तथा नवाष्टी षट्च घाण्टिकः ॥ निजघान क्षणात्तत्र वीरान् व्याघ्रश्च षोडश ॥ एकोनविंशाः सुभटाः काबुकेन निषूदिताः ॥
वहाँ पर जो अपने एक कटे हुए हाथ को नहीं जान पाया, वह एक ही हाथ से हाथी के समान शत्रुओं पर प्रहार कर रहा था। उस स्थान पर इंगळे ने पच्चीस को, पोल ने बारह को, चोर ने चौदह को, उसी प्रकार घाटगे ने तेईस को, वाघ ने सोलह को इस प्रकार क्षणभर में ही वीरों को मार दिया एवं काबुक ने उन्नीस उत्कृष्ट योद्धाओं को मार दिया था।
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