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शिवभारतम् • अध्याय 13 • श्लोक 43
सन्नाहैः स्वैः समाकीर्णास्तेऽवतीर्णाः पुरन्दरात् । अम्बुदा इव गर्जतः सन्नध्दतरसैंधवाः ॥ तामतीत्य निशां तत्र प्रतीपविजिगीषया । प्रयाणाभिमुखीभूय कारयामासुरानकान् ॥
अपनी युद्ध सामग्री को लेकर, अतिशय सज्ज घोड़े पर बैठकर बादल की तरह गर्जना करते हुए वे पुरंदर किले के नीचे उतर गये और रात्रि वही पर व्यतीत करके शत्रु को जीतने के इच्छुक वे सब प्रस्थान अभिमुख होकर, उन्होंने ढोल बजवाया।
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