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शिवभारतम् • अध्याय 13 • श्लोक 97
केचनच्छिन्न चरणाः केचन च्छिन्नपाणयः ॥ केचन च्छिन्नवर्माणः केचन च्छिन्नवक्षसः ।। छिन्नत्रिकास्तथा केचित् केचिच्छिन्नफोणयः ॥ रणन्तः करुणं मम्लुर्विलुठन्तो महीतले ।।
किसी के पैर टुटकर, किसी के हाथ टुटकर, किसी के कवच खण्डशः होकर, किसी की छाती भिन्न होकर, किसी की रीढ़ की हड्‌डी टुटकर, तो किसी की कोहनी फुटकर, वे करुणा जनक आवाज निकालकर पृथ्वी पर लुढक-लुढकर मूर्च्छित हो गये।
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