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शिवभारतम् • अध्याय 13 • श्लोक 41
अधारातिप्रमथनो जगत्स्थापकवंशजः । प्रवृध्दप्रधनामोदो गोदोनाम महायुधः ॥ व्याघ्रान्वयस्तथा भीमो भीमो भीम इवापरः । दलितद्वेषिदोः स्तम्भदम्भस्सम्भश्च काण्टिकः ॥ शृ‌ङ्गारस्सङ्गरा‌ङ्गानामि‌ङ्गालकुलसम्भवः । शिवचोत्तालकुन्ताग्रः करालः कालसन्निभः ॥ परवीराश्रियां चोर चोरवंश्यो गणाग्रणीः । भीकोऽतिभीषणानीको ऽत्यभीको रणकर्मणि ॥ वैरिवित्रासजननो युधि भैरवभैरवः । सभाभिर्भासमानोऽस्य सनाभिरपि भैरवः ॥ अमी शैलपतेश्शूराः सूरा इव सतेजसः। स्वया स्वया श्रिया रम्याः प्रणम्यामुं प्रतस्थिरे ॥
शत्रुओं का विध्वंस करने वाला, व्यूह युद्ध में आनन्दित होने वाला, महायोद्धा गोदाजी जगताप, मानो दूसरा भीम ही हो ऐसा भयंकर भीमाजी वाघ, शत्रुओं के बाहुबल के अभिमान का नाश करने वाला संभाजी काटे, यमराज की तरह भयंकर युद्धों के अंगों का श्रृंगार, जिसके भाले का अग्रभाग उठा हुआ है ऐसा शिवाजी इंगळे, शत्रुओं की लक्ष्मी का हरण करने वाला, युद्धकार्य में अत्यन्त निर्भय, अत्यन्त भीषण सैन्यबल से युक्त ऐसा सेनापति भीकाजी चोर, शत्रुओं की पीड़ा को बढ़ाने वाला, युद्ध में भैरव की तरह भयंकर, वह भैरव नाम वाला, वह इसका सगा भाई सूर्य के समान तेजस्वी था, अपने-अपने शोभा से शोभायमान इन शूरवीरों ने सैनिकों के स्वामी शिवाजी को प्रणाम करके प्रस्थान किया।
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