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शिवभारतम् • अध्याय 13 • श्लोक 81
उरच्छदमनिर्भिद्य द्रुतमुत्पतिताः शराः ॥ क्षणं नमस्यभासन्त यथा वैभाकराः कराः ॥
कवच को छिन्न-भिन्न करने में असमर्थ होने से शीघ्र ही ऊपर उड़े हुए वह बाण सूर्य की किरणों की तरह क्षणभर आकाश में चमके।
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