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शिवभारतम् • अध्याय 13 • श्लोक 52
यशसे दयितां स्वीयां दशास्यदमनो जही ॥ यशसे दानवाधीशो बलिः पातालमाययौ ॥ यशसे दानवारातिः कामठीं तनुमाददे ।। यशसे स्वयमुत्कृत्योत्कृत्य मांसं शिविर्ददौ ।। यशसे खण्डपरशुः सद्यो हालाहलं पपौ ।। यशसेऽस्थीन्यहोत्कृत्य दधीचिस्सद्गति ययौ ।। यशसे काश्यपी सर्वामत्यजज्जमदग्निजः ॥ यशसे शरशय्यायामशेत स्वर्णदीसुतः ॥ तदद्य यशसेऽर्थाय प्रतियोत्स्यामहे परान् ॥ यावन्न प्रहरन्त्येते वीक्ष्य वीक्ष्य वरान् वरान् ॥
यश प्राप्ति के लिए राम ने अपनी पत्नी को छोड़ दिया, यशप्राप्ति के लिए राक्षसों का राजा बली पाताल चला गया, यशप्राप्ति के लिए ही शिवि राजा ने अपने मांस के टुकड़े करके दिये, यश के लिए ही शंकर ने हलाहल विष को पी लिया, यश के लिए ही दधीचि ने अपनी ह‌ड्डियां दी एवं सङ्गति को प्राप्त हो गये, यश के लिए ही परशुराम ने सम्पूर्ण पृथ्वी को छोड़ दिया था, यशप्राप्ति के लिए ही भीष्म शरशय्या पर सोये थे, इसलिए आज जब तक इनमें से प्रमुख- प्रमुख लोगों को चुनकर मारेंगे नहीं तब हम यश के लिए और धन के लिए शत्रुओं के साथ युद्ध करते रहेंगे।
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