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अध्याय 2 — उत्तरमेघः

मेघदूतम्
55 श्लोक • केवल अनुवाद
जहाँ (अलकापुरी) में सुन्दर स्त्रियों वाले, चित्रों से युक्त, सङ्गीत के लिए मृदङ्ग बजाये गये, मणिजटित फर्शों वाले, गगनचुम्बी शिखरों वाले भवन बिजली धारण करने वाले, इन्द्रधनुष से युक्त, मधुर व गम्भीर गर्जन वाले, (अपने) अन्दर जल (धारण करने) वाले (और) ऊँचे तुमसे उन-उन गुणों के कारण बराबरी करने में समर्थ (है)।
जहाँ (अलकापुरी में) स्त्रियों के हाथ में क्रीड़ा के कमल, बालों में नये कुन्द पुष्पों का गुम्फन, मुख में लोध के पुष्पों की धूलि से धवलता को प्राप्त शोभा, जूड़े में नवीन कुरवक के पुष्प, कानों में सुन्दर शिरीष पुष्प और माँग में तुम्हारे आने से उत्पन्न होने वाला कदम्ब पुष्प (रहता है)।
जहाँ (अलकापुरी में) वृक्ष सदा पुष्यों से युक्त (एवं) मतवाले भ्रमरों से गुञ्जायमान (है), कमलनियाँ सदा कमलों से युक्त (तथा) हंसों की पंक्तियों से बनी करबनियों वाली (है), भवनों के (पालतू) मोर चमकने वाले पंखों वाले (और) बोलने के लिए गरदन उठाये हुए और रातें नित्य चाँदनी से युक्त (अतः) नष्ट हुए अन्धकार के प्रसार वाली और सुन्दर हैं।
जहाँ (अलकापुरी में) यक्षों के आँसू आनन्द या प्रसन्नता से उत्पन्न (होते है), अन्य कारणों से नहीं, प्रियजन के मेल से दूर होने वाले, कामदेव के वाण से उत्पन्न (ताप) के अतिरिक्त (अन्य कोई) सन्ताप नहीं है, प्रणय कलह के अतिरिक्त अन्य (कारण) से वियोग की प्राप्ति भी नहीं (है) और यौवन के अतिरिक्त कोई दूसरी अवस्था भी नहीं है।
जिस (अलकापुरी) में यक्ष सुन्दर स्त्रियों के साथ मिलकर स्फटिक मणि से जटित (अतः) तारों के प्रतिबिम्ब रूपी पुष्पों से सुशोभित, महलों को अटारियों पर जाकर तुम्हारे समान गम्भीर ध्वनि वाले पुष्कर नामक बाजों (नगाड़ों) के धीरे-धीरे बजाये जाने पर, कल्पवृक्ष से उत्पन्न रतिफल नामक मदिरा का सेवन करते हैं।
जिस (अलकापुरी) में गङ्गा नदी के जल से शीतल पवनों द्वारा सेवा की जाती हुई, किनारों पर उगे हुए, मन्दार वृक्षों की छाया से रोकी गयी धूप वाली, देवताओं के द्वारा चाही जाने वाली, कन्याएँ सोने की बालू में मुट्ठी में रखकर छिपायी गयी, (अतएव) खोजी जाने वाली मणियों से खेलती हैं।
जिस (अलकापुरी) में चञ्चल हाथों वाले प्रेमियों के द्वारा अधोवस्त्र की गाँठ के खुल जाने से ढीले हुए रेशमी वस्त्र को राग के कारण हटा देने पर लज्जा से हक्की-बक्की हुई, विम्ब फल के समान ओठों वाली (स्त्रियों) की चूर्ण की मुट्ठी किरणों से उन्नत, रत्नरूपी दीपकों के सामने पहुँचकर भी निष्फल फेंकी हुई हो जाती है।
प्रेरक वायु द्वारा जिस (अलकापुरी) के सात मंजिलों वाले भवनों के ऊपर के भागों में ले जाये गये, चित्रों में जल कणों से दोष को उत्पन्न करके, शीघ्र ही भय से स्पर्श किये गये, मानो धुएँ के निकलने का अनुकरण करने में निपुण तुम्हारे जैसे मेघ छिन्न-भिन्न होकर खिड़कियों में से निकल जाते हैं।
जहाँ (अलकापुरी में) अर्द्ध रात्रि में तुम्हारी रुकावट के हट जाने से निर्मल चन्द्रकिरणों (के सम्पर्क) के कारण स्वच्छ जलकण की बूंदों को टपकाने वाली झालरों में लटकती हुई, चन्द्रकान्त मणियाँ प्रियतमों की भुजाओं से ढीले पड़े आलिङ्गनों वाली स्त्रियों की रतिक्रीड़ा से उत्पन्न शारीरिक थकान को दूर करती हैं।
जहाँ (अलकापुरी में) भवनों के अन्दर अपार निधियाँ रखने वाले, अप्सरा रूपी वेश्याओं को साथ लिये बातचीत करते हुए कामीजन प्रतिदिन मधुर स्वर वाले (और) कुबेर के यश को ऊँचे स्वर में गाने वाले किन्नरों के साथ वैवाज नाम वाले बाहरी उद्यान का उपभोग करते हैं।
जिस (अलकापुरी) में अभिसरण करने वाली स्त्रियों का रात्रि का मार्ग सूर्य के निकलने पर चलने में हिलने के कारण बालों से गिरे हुए मन्दार के पुष्पों से, कान से गिरे हुए पत्तों के खण्डों से और स्वर्ण कमलों से और स्तन प्रदेश पर टूटे हुए धागों वाले मोतियों की लड़ों से तथा पुष्यों के हारों से सूचित हो जाता है।
जिस (अलकापुरी) में अनेक वर्षों के वस्त्रों को, नेत्रों को विलास सिखाने में समर्थ मदिरा को, नवपल्लवों के साथ पुष्पों के विकास को, आभूषणों के अनेक प्रकार तथा चरण रूपी कमल में लगाने योग्य महावर - इस प्रकार स्त्रियों की सम्पूर्ण प्रसाधन सामग्री को अकेला कल्पवृक्ष ही उत्पन्न करता है।
जिस (अलकापुरी) में घोड़े पत्तों के समान हरे (इसलिए) वर्ण और वेग में सूर्य के घोड़ों से प्रतिस्पर्धा करने वाले हैं, हाथी पर्वतों के समान ऊँचे तथा मद के टपकने (बहने) के कारण तुम्हारे समान वर्षा करने वाले हैं, श्रेष्ठ योद्धा युद्ध में रावण के सामने टिके हुये (इसलिए रावण की) चन्द्रहास नामक तलवार के घाव रूपी चिन्हों के कारण आभूषण धारण करने की इच्छा को छोड़े हुए हैं ।
जहाँ (भलका में) कामदेव कुबेर के मित्र महादेव शिव को प्रत्यक्ष रूप से रहता हुआ जानकर भय के कारण भ्रमर रूपी डोरी वाले धनुष को धारण नहीं करता, (क्योंकि) उसका कार्य टेढ़ी भौंह करके चलाये गये नेत्रों वाले, कामुकञ्जन रूपी निशानों पर, सफल चतुर स्त्रियों के हाव-भाव से ही बन जाता है।
वहाँ (अलकापुरी) में कुबेर के महल से उत्तर की ओर हमारा घर, इन्द्रधनुष के समान सुन्दर बाह्य द्वार से दूर से ही दिखायी देने वाला है, जिसके पास में मेरी प्रियतमा द्वारा पाला गया, गोद लिया पुत्र, हावों से प्राप्त करने योग्य गुच्छों द्वारा झुकाया गया छोटा-सा मन्दार का वृक्ष है।
और इस (मेरे घर) में पन्ने की शिलाओं से बनी सीढ़ियों के मार्ग वाली, चिकने लहसुनिये रत्न के समान नाल वाले, स्वर्णमय, विकसित कमलों से ढकी हुई बावड़ी है, जिसके जल में निवास करने वाले, अतः नष्ट हुए दुःख वाले हंस तुम्हें देखकर भी समीपवर्ती मानसरोवर को जाने के लिए उत्कण्ठित नहीं होंगे।
उस (बावड़ी) के किनारे पर सुन्दर इन्द्रनीलमणियों से निर्मित शिखरों वाला (और) सुनहरी केलियों की बाड़ के कारण दर्शनीय क्रीड़ा पर्वत है। हे मित्र! किनारों पर चमकती हुई बिजली वाले तुमको देखकर - मेरी पत्नी का प्रिय है - इस कारण व्याकुल चित्त से उसी का (क्रीड़ा पर्वत का) स्मरण कर रहा हूँ।
यहाँ (क्रीड़ाशैल पर) कुरवक की बाड़ वाले माधवी लता के कुञ्ज के अत्यन्त पास में हिलते हुए नवीन कोपलों वाला अशोक एवं सुन्दर बकुल (मौलसरी) का वृक्ष है, (उनमें से) एक मेरे साथ तुम्हारी सखी के (भाभी के) बायें पैर (के प्रहार) का इच्छुक है (और) दूसरा (बकुल का वृक्ष) दोहद के बहाने से उसके मुख की मदिरा को चाहता है।
और उन (रक्ताशोक और बकुल) के बीच में नवीन बाँस के समान कान्ति वाली मणियों से जड़ में बँधी हुई एवं स्फटिक (बिल्लौर) मणि के फट्टे (तख्ते) वाली रहने की यष्टि (है)। मेरी प्रिया द्वारा झन-झन बजते हुए कङ्गनों से मनोहर तालियों से नचाया गया तुम्हारा मित्र मयूर दिन के बीतने पर जिस पर बैठा करता है।
हे निपुण (सज्जन)! हृदय में रखे गये इन (पूर्व वर्णित) लक्षणों से (और) द्वार के पाशर्वो में चित्रित (बनाये गये) आकृति वाले शङ्ख और पद्म (नामक निधियों) को देखकर इस समय मेरे विरह से निश्चित ही क्षीण शोभा वाले (मेरे) भवन को पहिचान लोगे। (क्योंकि) सूर्य के चले जाने पर (अस्त हो जाने पर) कमल अपनी शोभा को पुष्ट (धारण) नहीं करता है।
(हे मेघ!) शीघ्र प्रवेश करने के लिये तत्काल हाथी के बच्चे के समान छोटे आकार को प्राप्त कर पहले कहे गये, सुन्दर शिखर वाले क्रीड़ा पर्वत पर बैठे हुए (तुम) मन्द-मन्द प्रकाश वाली जुगनुओं को पंक्ति की चमक से समानता रखने वाली बिजली की चमक रूपी दृष्टि को घर के अन्दर डालने में समर्थ हो।
वहाँ (भवन के अन्दर) पतले शरीर वाली, नवयौवन वाली, नुकीले दाँतों वाली, पके हुए बिम्बफल के समान नीचे के ओठ वाली, पतली कमर वाली, डरी हुई हरिणी के समान चितवन वाली, गहरी नाभि वाली, नितम्बों के भार के कारण मन्दगति वाली, स्तनों के कारण कुछ झुकी हुई, युवतियों के विषय में ब्रह्मा की मानो सर्वप्रथम रचना हो (उसे मेरा दूसरा प्राण समझना)।
मुझ साथी के दूर स्थित होने पर चकवी के समान अकेली, कम बोलने वाली उस (स्त्री) को मेरा दूसरा प्राण समझना। (विरह से) लम्बे इन दिनों के बीतने पर गाड़ी उत्कण्ठा वाली (उस) युवती को पाले से पीड़ित (मारी गयी) कमलिनी के समान अन्य रूप वाली हुई मानता हूँ।
अधिक रोने से सूजे हुए नेत्रों वाला, लम्बे-लम्बे साँसों की गर्मी से कान्तिहीन निचले ओठ वाला, हाथ पर रखा हुआ, लटकते हुए बालो के कारण सम्पूर्ण न दिखने वाला, उस (मेरी प्रिया) का मुख तुम्हारे आवरण से क्षीण कान्ति वाले चन्द्रमा की विवर्णता को निश्चित रूप से धारण कर रहा होगा।
वह (मेरी प्रिया) पूजा में लगी हुई या विरह से दुबले (तथा) कल्पना से ही जाने गये मेरे आकार को चित्रित करती हुई या मीठा बोलने वाली पिंजरे में बन्द मैना से - हे रसीली! क्या तुझे कभी स्वामी की याद आती है, क्योंकि तू उनकी प्यारी है; यह पूछते हुए तेरी दृष्टि में शीघ्र पड़ेगी।
हे सौम्य! मैले वस्त्रों वाली गोद में वीणा को रखकर मेरे नाम के चिह्न वाले (तथा) रचे हुए पदों वाले गीत को उच्च स्वर में गाने की इच्छुक, आँसुओं से गीले हुए तार को किसी प्रकार पोंछकर बार-बार स्वयं बनायी गयी भी मूर्छना (स्वरों के चढ़ाव-उतार के क्रम) को भूलती हुई (तेरी दृष्टि में शीघ्र पड़ेगी)।
अथवा विरह के दिनों से निश्चित की हुई (शाप की) अवधि के शेष रहे महीनों को देहली पर रखे गए पुष्यों के द्वारा गिनने से पृथ्वी पर रखती हुई अथवा मन में कल्पना के द्वारा आरम्भ किये गये संभोग का आस्वादन करती हुई (वह मेरी प्रिया तेरी दृष्टि में शीघ्र पड़ेगी)। प्रिय स्त्रियों के प्रियतमों के वियोग के दिनों में (ये) ही मन बहलाने के उपाय होते हैं।
दिन में काम में लगी हुई तेरी भाभी को (मेरा) वियोग उतना नहीं सताता होगा (परन्तु) रात में विनोद रहित (तेरी उस भाभी के) अधिक दुःखी होने की आशङ्का करता हूँ, (अतः) अर्द्धरात्रि में उचटी हुई नींद वाली पृथ्वी पर लेटी हुई पतिव्रता उसको मेरे सन्देशों के द्वारा अत्यधिक सुखी करने के लिये भवन के झरोखे में बैठकर देखना।
मनोव्यथा से क्षीण हुई विरह की शय्या (सेज) पर टेके हुए एक पार्श्व वाली, मानो पूर्व दिशा के मूल (क्षितिज) में एक कलामात्र अवशिष्ट चन्द्रमा की मूर्ति (तथा), जो रात मेरे साथ इच्छानुसार रमण क्रियाओं के द्वारा एक क्षण के समान व्यतीत की थी, उसे ही वियोग के कारण लम्बी (असहज) हुई को गर्म आँसुओं के द्वारा बिताती हुई (उस पतिव्रता को देखना)।
झरोखों (खिड़‌कियों) के मार्ग से अन्दर प्रविष्ट हुई, अमृत के समान शीतल, चन्द्रमा की किरणों की ओर पूर्व स्नेह के कारण गयी हुई (लेकिन) तुरन्त ही लौटी हुई दृष्टि जो दुःख के कारण आँसुओं से भारी पलकों से ढकती हुई मेघों से आच्छन्न दिन में अविकसित (और) अमुकुनित स्थलकमलिनी (भूमि पर उत्पन्न होने वाली कमलिनी) के समान (स्थित) (उस पतिव्रता को देखना)।
साधारण (तेल आदि से रहित) स्नान से रूखे, निश्चय ही कपोलों तक लटकने वाले बालों की किसलय के समान निचले ओठ को पीड़ित (तपाने वाले) कर देने वाले लम्बे साँस से हिलाती हुई, (तथा) स्वप्न में उत्पन्न भी मेरा संभोग किसी प्रकार प्राप्त हो जाये - इस प्रकार आँखों के पानी के प्रवाह से रोके गये स्थान वाली निद्रा की इच्छा करती हुई (उस पतिव्रता को देखना)।
विरह के पहले दिन पुष्पमाला को त्यागकर, जो चोटी बाँधी थी; शाप के अन्त होने पर नष्ट हुए शोक वाले मेरे द्वारा खोले जाने वाली, स्पर्श करने में दुःखदायी, कठोर, उलझी हुई एक वेणी रूप उस (शिखा) को, बिना कटे नाखूनों वाले हाथ से गालों के प्रदेश से बार-बार हटाती हुई (उस पतिव्रता को देखना)।
दुर्बल हुई (तथा) आभूषणों का त्याग किये हुये, बार-बार कठिनाई से शय्या पर रक्खे हुए, कोमल शरीर को धारण करने वाली वह (तुम्हारी भाभी) अवश्य ही तुमको भी नये जल के रूप मे आँसुओं को छुड़ा देगी अर्थात् रुला देगी। (क्योंकि) प्रायः कोमल हृदय वाले सभी दयालु स्वभाव के होते हैं।
(मै) तुम्हारी सखी (भाभी) के मन को अपने प्रति स्नेह से भरा हुआ जानता हूँ, इसलिए मैं उसे प्रथम विरह में इस प्रकार (अति दुर्बल) हुई सोचता हूँ, अपने को सौभाग्यशाली समझने का भाव मुझे मुखर नहीं बना रहा है। हे भाई, मैंने जो कुछ कहा है, (वह) शीघ्र ही तुम्हें प्रत्यक्ष (हो जायेगा)।
बालों से रोकी गयी कोरों की गति वाला, काजल की चिकनाई से रहित और मदिरा के त्याग से भौंहों के विलास को भूला हुआ तुम्हारे समीप आने पर ऊपर के भाग में फड़कने वाला, मृगनयनी का नेत्र मछली की हलचल से यश्चल कमल की शोभा की समानता को प्राप्त करेगा - ऐसी मेरी संभावना है।
मेरे नखों के चिह्नों से छोड़ी जाती हुई, दुर्भाग्यवश बहुत समय से जानी पहचानी मोतियों की लड़ी को छोड़ देने वाली, संभोग के अन्त में मेरे हाथों से दबाई जाने योग्य, सरस केले के तने के समान गौर वर्ण, इस (मेरी प्रिया) की बायीं जंघा फड़क उठेगी।
हे मेघ! उस समय (तुम्हारे उसके पास पहुँचने के समय) यदि वह (प्रिया) निद्रा का सुख प्राप्त कर रही हो तो उसके पास बैठकर गर्जन से विमुख होकर प्रहर भर तक प्रतीक्षा करना। (ताकि) इस (प्रिया) का मुझ प्रिय के किसी प्रकार स्वप्न में मिलने पर (किया गया) गाढ़ आलिङ्गन शीघ्र ही कण्ठ से शिथिल हुए लता-जैसी भुजाओं के वन्धन वाला न हो जाये।
मध्य में बिजली वाले (और) धीर हुए (तुम) अपने जल की बूंदो से शीतल वायु द्वारा उस मनस्विनी को उठाकर चमेली की नयी कलियों के साथ आश्वस्त हुई तथा तुमसे युक्त झरोखे पर निश्चल दृष्टि लगायी हुई के साथ गर्जन रूपी वचनों से बोलना प्रारम्भ करना।
हे सौभाग्यवति! मुझे (अपने) पति का प्रिय मित्र (और) हृदय में रखे हुए उसके संदेशों के साथ तेरे समीप आया हुआ मेघ जानो, जो (मेघ) (अपनी) गम्भीर और मधुर ध्वनियों से अबलाओं की चोटियों को खोलने को उत्सुक (तथा) मार्ग में थके हुए प्रवासियों के समूहों को (घर लौटने के लिये) प्रेरित करता है।
इस प्रकार कहा जाने पर ऊपर की ओर मुख किये हुए (और) उत्कण्ठा से विकसित चित्त होकर, वह (मेरी प्रिया) पवन पुत्र (हनुमान्) को सीता के समान, तुम्हें देखकर और (तुम्हारा) आदर करके आगे सावधान होकर सुनेगी (क्योंकि) हे सौप्य! स्त्रियों को (पति के) मित्र द्वारा लाया गया पति का सन्देश मिलन से कुछ ही कम होता है।
हे आयुष्मन्! मेरी ओर से और अपने को उपकृत करने के लिए उस (मेरी प्रिया) से इस प्रकार कहना - 'हे अबले! तुम्हारा साथी (पति) रामगिरि आश्रम में रहता हुआ जीवित है, बिछुड़ा हुआ (यह) तुम्हारा कुशल पूछता है।' सहज ही विपत्ति में पड़ने वाले प्राणियों से यह ही पहले पूछना चाहिये।
विपरीत भाग्य द्वारा रोके गये मार्ग वाला (और तुमसे) दूर रहने वाला, (तेरा पति) दुर्बल, अत्पन्त तपे हुए, आँसुओं से युक्त, उत्कण्ठित, लम्बे-लम्बे साँसों को लेने वाले शरीर से (तुम्हारे) अत्यधिक कृश, तपे हुए, बहुत आँसुओं से भरे हुए, निरन्तर उत्कण्ठित (और) गर्म साँसों वाले शरीर से उन-उन मनोरथों के साथ मिलता है।
जो (मेरा प्रिय) तेरी सखियों के सामने शब्दों से कहने योग्य भी जो (होता था), उसे सचमुच (तेरे) मुख के स्पर्श के लोभ से कान में कहने के लिए लालायित रहता था, कानों की पहुँच से बाहर हुआ (तथा) नेत्रों से न दिख पड़ने वाला यह (तेरा प्रिय) उत्सुकता से रचे गये शब्दों वाले इस (सन्देश) को मेरे मुख से तुमसे कहता है।
प्रियङ्गगु लताओं में (तेरे) शरीर की, भयभीत हुई हरिणियों की चितवन में (तेरे) मुख की कान्ति की, मयूरों के पयों के समूहों में (तेरे) केशों की (और) हल्की-हल्की नदियों की तरङ्गों में (तेरे) मुद्धों की कल्पना किया करता हूँ। खेद है कि हे कोप करने वाली! किसी भी एक (वस्तु) में तेरी समानता नहीं है।
(हे प्रिय!) प्रणय में रूठी हुई तुमको गेरू के रंग से पत्थर पर चित्रित कर जैसे ही मैं स्वयं को तेरे चरणों में गिरा हुआ बनाना चाहता हूँ, वैसे ही बार-बार उमड़े हुए आँसुओं से मेरी दृष्टि लुप्त हो जाती है। निर्दय दैव, उस (चित्र) में भी हम दोनों के मिलने को नहीं सहता है।
स्वप्न के ज्ञान में मेरे द्वारा किसी तरह (कठिनाई से) प्राप्त की गयी तेरे गाढ़ आलिङ्गन के लिए आकाश में भुजा फैलाये हुए, मुझे देखती हुई वन देवियों की मोतियों के समान मोटी आँसुओं की बूंदें वृक्षों की कोपलों पर बहुत बार न गिरती हों, ऐसी बात नहीं अर्थात् अवश्य गिरती हैं।
हे गुणशालिनि, देवदारु वृक्षों की कोपलों की परतों को शीघ्र ही भेदकर उनके दूध के स्राव से सुगन्धित जो (पवन) दक्षिण दिशा की ओर चलते हैं, मैं उन हिमालय पर्वत के पवनों का "इन्होंने सम्भवतः तेरे शरीर का पहले स्पर्श किया होगा" ऐसा सोचकर आलिङ्गन करता रहता हूँ।
लम्बे प्रहरों वाली रात्रि क्षण के समान किस प्रकार छोटी हो जाये और दिन सभी अवस्थाओं में मन्दी-मन्दी धूप वाला कैसे हो? हे चञ्चल नेत्रों वाली! इस प्रकार दुर्लभ अभिलाषा वाले मेरे मन को अतितीव्र ताप वाली तेरे वियोग की पीड़ाओं ने अनाथ बना दिया है।
हे प्रिय! बहुत विचार करता हुआ (मैं) अपने आप ही अपने को सहारा दिये रहता हूँ। हे सुभगे! इसलिए तुम भी बहुत अधिक व्याकुल मत होओ। अत्यन्त (लगातार) सुख अथवा लगातार दुःख किसे प्राप्त होता है? (लोगों की दशा) पहिये के अरे के क्रम से नीचे और ऊपर जाती रहती है।
भगवान् विष्णु के शेषनागरूपी शय्या से उठ जाने पर मेरे शाप का अन्त (होगा) (इसलिए) तू शेष चार महीने आँख मींधकर बिता ले। फिर हम दोनों विरह में विचारी गयी उन-उन अपनी इच्छाओं को ढली हुई शरद् ऋतु की चाँदनी वाली रात्रियों में भोगेंगे।
(तुम्हारे पति ने) फिर (आगे) कहा - पहले कभी शय्या पर मेरे गले लगी हुई तुम नींद में पड़कर किसी कारण जोर से रोती हुई जाग गयीं और तुमने बार-बार पूछने वाले मुझसे मन ही मन हँसी के साथ कहा था - हे धूर्त! मैंने स्वप्न में तुम्हें किसी (स्त्री) के साथ रमण करते देखा है।
हे काले नेत्रों वाली! इस पहिचान के बताने से मुझे सकुशल जानकर लोकापवाद के कारण मेरे प्रति अविश्वासिनी न हो। (लोग) विरह में स्नेह भाव नष्ट हो जाते हैं, ऐसा व्यर्थ ही कहते हैं। ये (स्नेह भाव) तो भोगे न जाने के कारण प्रिय वस्तु के प्रति प्रेम रस के बढ़ जाने पर प्रेमपुञ्ज बन जाते हैं।
प्रथम वियोग के कारण तीव्र दुःख वाली, अपनी सखी (भाभी) को पूर्वोक्त प्रकार से आश्वासन देकर तीन नेत्रों वाले (शिव) के बैल द्वारा उखाड़े गये शिखरों वाले, (कैलाश) पर्वत से शीघ्र (ही) लौटकर (तुम) पहिचान के साथ भेजे गये कुशल से युक्त उस (प्रिया) के वचनों से प्रातः कालीन कुन्द पुष्प के समान शिथिल हुए मेरे भी प्राणों को धारण कराना।
हे सज्जन! तुमने मुझ मित्र का यह कार्य (करना) निश्चित कर लिया है न? निश्चित ही आपने अस्वीकार नहीं किया, इससे मैं आपके धैर्य की कल्पना कर रहा हूँ। क्योंकि माँगने पर चुपचाप रहकर भी दातकों को जल देते हो। सज्जनों का अभिलषित कार्यों को पूरा करना ही याचकों के लिए उत्तर होता है।
हे मेघ! प्रेम के कारण अथवा वह दुःखी (वियोगी) है इसलिए मेरे प्रति दया-भाव के कारण मुझ अनुधित प्रार्थना करने वाले का यह प्रिय करके वर्षा ऋतु से बड़ी हुई शोभा वाले (तुम) इच्छित देशों में विचरण करना और इस प्रकार (अर्थात् मेरे समान) क्षण भर के लिए भी तेरा बिजली से वियोग न होवे।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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